सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

१३२ नामदेव की हिन्दी कविता
भजन के बिना वह जी नहीं सकता। यही उसकी रहनी है। यह भाव-भक्ति है। इसी
को प्रेम लक्षण भक्ति भी कहा जाता है।
नामदेव की भक्ति भी भाव-भक्ति है। वे भी भक्ति तथा ऐहिक कार्य की एकता
पर बल देते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका का काम करते समय
हरि भजन या नाम स्मरण भी करते रहना चाहिए। नामदेव कहते हैं कि मेरा मन
गज है और जिह्वा कैंची है। मैं मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता से
यम का बंधन काटता हूँ। मैं कपड़ा रंगने और सिलने का काम करता हूँ—घड़ी भर
के लिए भी भगवन्नाम विस्मृत नहीं करता हूँ। १
नामदेव के विचार से राम का ध्यान संसार के सभी आवश्यक कार्य करते हुए
करना चाहिए। उनका कथन है कि 'मेरा मन राम नाम से इस प्रकार बिंधा हुआ है
जैसे स्वर्ण तोलते समय सुवर्णकार का ध्यान तुला की ओर बना रहता है। जिस प्रकार
युवतियाँ सिर पर पानी से भरे घड़े लेकर आपस में मनोविनोद करती हुई चलती हैं
किंतु उनका ध्यान सदा घड़ों पर ही रहता है, जिस प्रकार माता का मन घरेलू झंझटों
में फँसे रहने पर भी पलने में पौढ़ाये हुए अपने बालक की ओर रहता है उसी प्रकार
मेरा मन उसमें लगा रहता है।' २
भाव भगति का प्रतिपादन करते हुए नामदेव एक अन्य स्थान पर कहते हैं कि
हृदय में सच्चा भाव नहीं है और नामदेव हरि का नाम लेता है। हे केशव ! पानी के
बिना नाव कैसे तरेगी ? ३
१. मन मेरो गजु जिह्वा मेरी काती।
मरि मरि काटउ जम की फासी ॥१॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥२॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८।
२. ऐसो मन राम नामै बेधिला। जैसे कनक तुला चित राखिला ॥टेक॥
आनिले कुंभ भराइले उदिक, राजकुंवारि पुरंदरिये।
हसत बिनोद देत करताली चित सू गागरि राखिला ॥
भणत नामदेव सुनो त्रिलोचन, बालक पलनि पोढ़िला।
अपने मंदिर काज करती, चित सू बालक राखिला ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६।
३. अभि अंतर नही भाव, नाम कहै हरि नाव सू।
नीर बिहूनी नाव, कैसे तिरिबो केसवे ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृष्ठ ११४ (साखी १)