सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने सहज समाधि को सर्वोत्तम बताया है। आँखें मूंदे बिना, कान बन्द
किये बिना ही इसकी सिद्धि हो जाती है। सहजभाव के साथ खुली आँखों से भगवान्
को देखना ही सहज समाधि है। एक बार यदि यह सिद्ध हो जाय तो साधक निरन्तर
परमानन्द का रस पान करने में तल्लीन रहता है ।१
यहाँ कबीर ने उन्मनि रहनी को सहज समाधि कहा है। इस स्थिति में द्वैत का
भाव नष्ट हो जाता है। यह अद्वैतावस्था है, सम्पूर्ण विश्व आत्ममय हो जाता है। जीवन
के सभी क्षेत्रों में सहज रूप से आत्म दर्शन उपलब्ध होता रहता है। योगी परिपूर्ण हो
जाता है। उसका मन विकार-रहित होकर केन्द्रीभूत हो जाता है।
हठयोग की साधना
संतों की साधना पद्धति के विषय में विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुमान
किये हैं। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार संतों की साधना को वस्तुत आत्मविचार
की साधना कहना उपयुक्त होगा।२ संतों की साधना के स्वरूप निर्धारण में संत कबीर
का प्रमुख हाथ है। डॉ० त्रिगुणायत का अनुमान है कि संत कबीर ने योग के क्षेत्र में
प्रचलित समस्त योग साधनाओं की परीक्षा करके अपना स्वानुभूतिमूलक सहज योग
प्रतिपादित किया जिसका पर्यवसान प्रवृत्तिमूलक भक्ति योग में हुआ।३
संतों ने जिस आत्मविचार को प्रधानता दी है उसके साथ ही अनेक परम्परागत
साधनाओं को भी अपने अन्दर पल्लवित पाया है जिनका प्रभाव मध्य-युग की साधना
पद्धति पर विशेष रूप से था। ये साधनाएँ मुख्यतः हठयोग की साधनाएँ तथा तान्त्रिक
१. सन्तो सहज समाधि भली।
साँई तै मिलन भयो जा दिन ते, सुरत न अंत चली॥
आँख न मूंदूँ कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन में हँस हँस देखूं सुन्दर रूप निहारूँ॥
जँह जँह जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दंडवत, पूजूं ओर न देवा॥
शब्द निरन्तर मनवा राता, मलिन वचन का त्यागी।
कहै कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट करि गाई।
सुख दुख के इक परे परम सुख, तेहि में रहा समाई॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४१।
२. कबीर साहित्य की परख, पृ० ६६।
३. कबीर की विचारधारा, पृ० २६८।