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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 332 में से

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पृष्ठ 125

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२६
जब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप आदि के करने से क्या
लाभ ? सांप केंचुली छोड़ देता है परन्तु विष नही छोड़ता ।¹
पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही ।²
जब तक अंतःकरण शुद्ध न हो तब तक नहाने धोने से क्या लाभ ? गले में तो
तुलसी की माला है और अंतःकरण कोयले सा काला है ।³
नाचने गाने तथा घिस घिस कर चंदन लगाने से क्या लाभ ? यदि तूने स्वयं
को नहीं पहचाना तो समझना होगा कि भ्रम में पड़ा तेरा मन चारों ओर भटक रहा है ।⁴
कबीर ने 'करनी बिना कथनी' की निन्दा की है। उनके अनुसार जब तक
मनुष्य के वचन और कर्म में सामंजस्य नहीं होता तब तक उसका सारा परिश्रम व्यर्थ
है। जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे
नरक को प्राप्त होते हैं ।⁵
केवल बाह्य रूप से राम नाम की रट लगाने से कुछ नहीं होता जब तक हृदय
में उसका महत्त्व नहीं जाना जाता । कबीर कहते हैं कि मनुष्य राम नाम का कीर्तन
बड़े जोर से मुख उठाकर करता है। वह वास्तविकता को न पहचान कर बिना सिर
कहत नामदेव ममता जाइ।
तो साध संगति में रहा समाई ॥ ३ ॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ११७ ।
१. काहे कू कीजै ध्यान जपना । जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छांड़ै बिख नहीं छाड़ै । उदिक में बग ध्यान माड़ै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
२. पापड भगति राम नही रीझै । बाहुरि आंधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।
३. न्हावै धोवै करै सनांन । हिरदै आपिन भाथै कान ॥१॥
गलि गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइला सा काला ॥२॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २४ ।
४. का नाचीला का गाईला । का घसि घसि चंदन लाईला ॥टेक॥
आपा पर नहिं चीन्हीला । तो चित चितारे डहकीला ॥१॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
५. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसो चालै नाहिं ।
मानिष नहिं ते स्वान गति, बांध्या जमपुर जाहिं ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
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