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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 332 में से

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पृष्ठ 129

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३३
अंतःकरण तो काला है और बाहर भक्ति का दिखावा करता है। नामदेव
कहते है कि हरि भजन के बिना उसे निश्चय ही नरकवास मिलेगा ।¹
अंतःकरण तो परमात्मा से अनुरक्त है परन्तु बाहर से उदास है। भाव भक्ति
के कारण मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ ।²
भाव-भगति को कबीर ने 'हरि सूं गठ जोरा' कहा है ।³ उनके अनुसार
'भगति' वा भक्ति से तात्पर्य 'हरि नाम का भजन' मात्र है। अन्य बातें अपार दुःख से
भरी हुई हैं ।⁴ नारद के समान कबीर ने भी भक्ति को कर्म, ज्ञान तथा योग से श्रेष्ठ
कहा है। वे उसे मुक्ति का एक मात्र उपाय मानते हैं ।⁵ जब तक भाव-भक्ति न करोगे
तब तक भव सागर कैसे पार कर सकते हो ?⁶
कर्मकांड को कबीर पाखंड ही के अंतर्गत मानते है क्योंकि परमात्मा की भक्ति
तन को स्वयं ही अपने अनुकूल बना लेगी। भक्ति की सच्ची भावना होने से कर्म भी
अनुकूल होने लगेंगे। परन्तु केवल माला जपने से अथवा पूजा पाठ करने से कुछ नही
१. अभि अंतरि काला रहै, बाहरि करै उजास ।
नाम कहै हरि भजन बिन, निहचे नरक निवास ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी २, पृष्ठ ११४
२. अभि अंतरि राता रहै बाहरि रहै उदास ।
नाम कहै मै पाइयो, भाव भगति बिसवास ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी ३ पृष्ठ ११४
३. कहै कबीर तन मन का ओरा ।
भाव भगति हरि सूं गठ जोरा ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद २१३, पृष्ठ १६०
४. भगति भजन हरि नांव है दूजा दुख अपार ।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरण सार ॥
—कबीर ग्रन्थावली साखी ४, पृष्ठ ५
५. भाव भगति बिसवास बिन कहै न संसै शूल ।
कहै कबीर हरि भगति बिन, मूकति नही रे मूल ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४५
६. जब लग भाव भगति नहीं करिहौ !
तब लग भवसागर क्यूँ तिरिहौ !
—कबीर ग्रन्थावली पृष्ठ २४५