सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 141, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४५
साक्षात्कार परमार्थ सोपान की अंतिम सीढ़ी है। साक्षात्कार होने के पहले
साधक बहुत बेचैन रहता है, व्याकुल रहता है। उसकी आँखो के सामने अँधेरा छा
जाता है। इसी को ईसाई साधको मे Dark night of the Soul कहा जाता है।
साक्षात्कार की परम उल्लासमयी घड़ी का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं कि जहाँ
वह दिव्य कांति झिलमिल झिलमिल चमक रही है, जहाँ तूर ढोल, दमामे आदि बाजो
के बजने पर अनहद नाद सुनाई देता है, जहाँ कोटि सूर्यों की तेजोरशि प्रकाशित हो
रही है वहाँ दास नामदेव का मन निश्चल होता है।¹
यद्यपि चित्त की वृत्तियों का निरोध एक कठिन कार्य है फिर भी संतों के लिए
योग का आकर्षण सदैव बना रहा है। संत कबीर इड़ा-पिंगला के माध्यम से गगन
मंडल में घर बनाने की बात करते हैं।² धर्मदास ने हठयोगजनित शून्य महल में
झरनेवाले रस को अपनी साधना का एक अंग माना था।³
वास्तव मे योग मार्ग भी भक्ति मार्ग के ही आश्रित है। यदि भक्ति नही है तो
योग मार्ग वृथा ही है।⁴
यद्यपि संतों ने हठयोग और कुण्डलिनी योग की चर्चा की है किन्तु वह उनका
लक्ष्य नही है। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग की क्रियाओ का संतो के आविर्भाव
काल में विशेष प्रभाव था। परंपरागत रूप में हठयोग की क्रियाएँ उत्तर भारत में
व्याप्त थीं। संतों में भी इनका निर्वाह मात्र हुआ है। हठयोग का यही रूप हमें संतो
१. झिलिमिलि झिलिमिलि नूरा रे । जहँ बाजे अनहद तूरा रे ॥ टेक ॥
ढोल दमामां बाजै रे । तहाँ शब्द अनाहद गाजै रे ॥ १ ॥
फिर राया जोति प्रकासी रे । जहाँ आपै आप अविनासी रे ॥ २ ॥
जहाँ सूरिज कोटि प्रकासा रे । तहाँ निश्चल नामदेव दासा रे ॥ ३३ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७० ।
२. अवधू गगन मंडल घर कीजै ।
अमृत झरै सदा सुख उपजै बंकनालि रस पीजै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ११० ।
३. झरि लागे महलिया गगन घहराय खन गरजै खन बिजुली चमकै ।
लहर उठै शोभा बरनि न जाय । सुन्न महल से अमृत बरसें ॥
—संत काव्य पृष्ठ २४६ ।
४. हिरदै कपट हरि सूं नाही साचौं ।
कहा भयौ जे अनहद नाचौ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १८२ ।
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