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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

१३६ नामदेव की हिन्दी कविता
जो जितना ही हरि के भक्तो से दूर रहेगा वह हरि (परमात्मा) से भी उतना
ही दूर रहेगा । नामदेव कहते हैं कि हरि के उस दास अथवा भक्त की मुक्ति कैसे
होगी ?१
जो अंधे के समान स्थान स्थान पर टटोलता है और संतो को पहचानता नहीं,
नामदेव कहते हैं कि बिना हरि के भक्तो से परिचित हुए वह भगवान को कैसे पा
सकता है ?२
नामदेव कहते हैं कि सब से 'निरवेरता' रखने वाला साधु पूजने योग्य होता है ।३
हीन जाति में पैदा होने की बात नामदेव को खटकती थी ।४ अपने एक पद
में वे कहते हैं—हे परमात्मा ! मेरी जाति हीन है वह किसी से सही नहीं जाती ।५
मैने छीपे के घर जन्म लिया । मुझे गुरु का उपदेश मिला । साधु संतो के
प्रसाद से मुझे भगवान के दर्शन सुलभ हो गये ।६
जे जन राम नाम रंगि राता, छाड़ि करम की आसा ।
घे जन रामे राम समाने, प्रणवत नामदेव दासा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२
१. जेता