सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३६
'पतंग आकाश में उड़ी तब मैने उसे न देखा। जब तक मनुष्य जय-अपजय की
बात सोचता है तब तक उसको परमात्मा की प्राप्ति नही होती। कहना-सुनना जब
समाप्त हो जाता है तभी उसका परिचय मिलता है। जिन्होंने उसका गुणगान किया वे
गये। जो इस संसार को छोड़कर चले गये उनका दूसरो ने गुणगान किया। मैं ऐसे
प्रभु का गुण गाता हूँ जिसका गुण अब तक किसी ने नही गया। नामदेव कहते है—मैं
निष्काम होकर सदा सहज समाधि में मग्न रहता हूँ।''
योगी का शासन युग-युग तक चलता है। वह श्वास का निरोध करता है। वह
अमृत का पात्र भर कर उसका पान करता है। जब योगी ने इस अमृत को प्राप्त करने
का प्रयत्न किया तो उसके पिता ने उसको ऐसा करने से परावृत्त किया और उसकी
माता वियोग से मर गई। नातेदारो ने उससे जो अपेक्षाएँ रखी थी वे पूरी न होने के
कारण उन्होने उसका त्याग किया। योगी अपने चर्मचक्षु बन्द कर अन्त:चक्षु से देखने
लगा। निष्काम होकर वह पंचेन्द्रियों के दासत्व से मुक्त हुआ। नामदेव कहते हैं—योगी
ने सहज समाधि लगा कर निरंजन की सेवा की।२
'परमात्मा सारे संसार में व्याप्त है अतः लोग उसके बारे मे कुछ कह तथा सुन
सकते हैं। उसको अभेद-रूप समझने से अभेद रूप में तथा भेद-रूप समझने से भेद रूप
पाठी तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५।
१. देवा गगन गुडी बैठी मै नाही तब दीठी॥ टेक॥
जब लगि आस निरास विचारे तब लगि ताहि न पावै॥ १ ॥
कहिबौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै॥ २ ॥
गाये गये गये ते गाये अगई कूँ अब गाऊँ॥ ३ ॥
प्रणवत नामा भए निहकामा, सहजि समाधि लगाऊँ॥ ४ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६
२. जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवे।
आकास बांधि पाताल चलावै, आप भरे भरि पीवै॥ टेक॥
अमृत पात पिता परबोध्यौ माइ मुँई करि सोय।
भाई बंध की आस न पूगी भाजि गए सब लोग॥ १ ॥
बाहिली मूँदिले माहिली चौंधिले पंच की बास मिटाइ रे।
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रे॥ २ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६७