सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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हो सकता। यह तो मानो और भी अधिक माया में पड़ना है।१ जब तक भगवान को
भाव-भक्ति से रिझा न लिया जाय तब तक जप, तप, व्रत, संयम, स्नान आदि से क्या
लाभ ?२
सत्संग की प्रधानता
पुरानी व्यवस्था ज्ञानमूलक समाज व्यवस्था की पक्षपाती थी। उसने चातुर्वर्ण्य
का समर्थन किया जिससे कालांतर में अनेक जातियाँ बनी। कबीर जाति-पाँति के
नियमो के कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि में सब मनुष्य समान थे तथा भगवद् भक्ति
का सबको समान अधिकार था। 'जाति पाँति पूछै नहि कोई। हरि को भजै सो हरि
का होई' उक्ति इसी सिद्धांत की द्योतक है।
जो हरि का भजन करता है वही हरिजन है। मनुष्य मात्र को हरिजन होना
चाहिये। संतो की जाति नही होती। सभी लोगो को संतो के चरित्र से शिक्षा लेनी है।३
जीवोत्पत्ति की दृष्टि से भी जाति व्यवस्था अप्राकृतिक है। पुराना वेदांत मानव
को उद्भिञ्ज मानता है किंतु कबीर के अनुसार सभी मानव योनिज हैं। भिन्न शरीरो
को धारण करने तथा वंशानुगत क्रमानुसार किसी जाति के परिवार विशेष में जन्म
ग्रहण करने के कारण लोग एक दूसरे को अपने से भिन्न मान लेते हैं। उस एक मात्र
सत्य के प्राकृतिक नियमो पर विचार करने से दो व्यक्तियो में कोई मौलिक अंतर नही
दीख पडता।
निर्गुण मत जाति व्यवस्था का उन्मूलन करता है। अलगाव की प्रथाओ का
खण्डन करता है, बाह्य आडम्बरो के निराकरण की अपील करता है और अंत में भक्ति
पूर्ण कथनी, करनी और रहनी की व्यवस्था करता है। इससे उसने एक नया समाज
बनाया जो 'सत्संग' के नाम से प्रसिद्ध है। यह सत्संग एक समतामूलक, भक्तिमूलक
तथा निजी आर्थिक व्यवस्था वाला संगठन है।
१. जप तप पूजा अरचा जोतिग जग बौराना ।
कागद लिखि लिखि जगत भुलाना मन ही मन न समाना ॥
२. क्या जप क्या तप सयम्रो क्या व्रत क्या इस्नान ।
जब लग जुक्ति न जानिये भाव भक्ति भगवान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३२६
३. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंद तुकैं दुइ दीन बने है कछु नही पहुचनियां ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा सार, पृष्ठ ४८