सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३७
मुझे भला जाति-पाँति से क्या लेना-देना ? मैं तो दिन-रात राम नाम जपता
हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं कि मेरा चित्त
भगवान में लगा हुआ है ।१
कबीर भी इस सत्संग के पुरस्कर्त्ता थे । इस साधन को उन्होंने विशेष महत्त्व
दिया है । वे कहते हैं कि यह शरीर मन के साथ रहता है अर्थात् यह पंछी हो रहा है ।
जहाँ पर मन हो वही शरीर उड़ जाता है । वास्तव में जो जिस संगति में रहता है उसे
उसी प्रकार का फल भी मिलता है ।२ एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि सत् पुरुष के
समीप बैठना कभी निष्फल नहीं होता । चंदन का वृक्ष यदि छोटा भी हो तब भी उसको
कोई नीम नहीं कह सकता ।३
कबीर साहब कहते हैं कि यह संसार काजल की कोठरी के समान है । इसमें
पैठ कर जो बिना कालिख लगाये बाहर निकल आये उसकी बलिहारी है ।४
अगर तुझे प्रेम की पीर की अनुभूति करना है तो पक्के साधु की संगति कर ।
कच्ची सरसों को कोल्हू में पेलकर क्या फायदा ? उससे न खली मिलती है न तेल ।५
यों तो उन्होंने स्थान स्थान पर साधुओं के गुणों का वर्णन किया है किंतु एक
स्थल पर अत्यन्त संक्षेप में उसकी विशेषताएँ निर्देशित कर दी हैं—ये (संत) 'निरवैरी'
अर्थात् किसी से किसी प्रकार की शत्रुता न रखने वाले होते हैं, 'निहकाम' होने के
१. का करो जाती का करौं पाती । राजाराम सेऊँ दिन राती ।
सुइने की सुई रुपे का धागा । नामे का चितु हरि सू लागा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८
२. कबीर तन पंछी भया जहाँ मन तहां उड़ि जाइ ।
जो जैसी संगति करे सो तैसे फल खाई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४८
३. कबीर संगति साध की कदे न निष्फल होइ ।
चंदन होसी बावना, नींब न कहसी कोइ ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४६
४. काजल केरी कोठरी, तैसा यहु संसार ।
बलिहारी ता दास की पैसि ज निकसणहार ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३
५ तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल ।
काँची सरसों पेरिके खली भया ना तेल ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३