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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 332 में से

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पृष्ठ 134

१३८ नामदेव की हिन्दी कविता
कारण किसी वस्तु की कामना न रखते हुए नि:स्वार्थ होते हैं, उन्हें 'साईं सेती नेहु'
अर्थात् परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम की भावना रहा करती है और वे सारे 'विषिया सू
न्यारा' अथवा अलग रहने के कारण निर्लिप्त व अनासक्त रहा करते हैं। १
सहज अवस्था
सहज समाधि की स्थिति में भाव-भगति से ओत-प्रोत स्वभाव को कबीर ने
'सहज सील' की संज्ञा दी है और बतलाया है कि किस प्रकार उक्त श्रेणी तक पहुँचे
हुए महापुरुष की प्रवृत्ति एक निराले ढंग की हो जाती है, जिसमें कुछ विशिष्ट गुणों का
समावेश रहा जाता है।
नामदेव ने कई बार 'सहज' शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार बाह्य
कर्म काण्डों से कोई लाभ नही। बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ
हैं। अत लोगो के आडम्बर पर उनको क्षोभ होता है। वे सहज कर्म करना चाहते हैं।
नामदेव सहज साधना को ईश्वर प्राप्ति का सबसे उत्तम मार्ग बतलाते थे।
सहज से उनका अभिप्राय उस निष्काम भक्ति में था जो बिना किसी साधना और कर्म
के तथा बिना पाखंड के सच्चे और सरल हृदय से की जाती है। हृदय में ईश्वर-प्रेम
की सच्ची अनुभूति ही साधक की सहज अवस्था कही जाती है।
नामदेव कहते है—हे परमात्मा ! वेणु बजती है और सारा आकाश गूंज उठता
है, जिससे अनहद-नाद उत्पन्न होता है। लोग अपने आप को नही पहचानते और भ्रम
में डोलते रहते हैं। चन्द्र और सूर्य नाड़ी को सम कर जीव ब्रह्म से मिल सकता है। मैं
सुषुम्ना को तारा मण्डल में लाता हूँ और तृष्णा पर काबू करता हूँ। बिना सायास के
मुझे गगन-मण्डल में स्थान मिला है। अन्तर ध्वनि पर में अपने मन को केन्द्रित करता
हूँ। यह स्थान किसी योगी को बड़ी कठिनाई से मिल सकता है। मैं फूलों तथा पत्तियों
से हरि की पूजा न करूँगा क्योकि वह मन्दिर में नही है। मैने हरि के चरणों पर अपने
आपको समर्पित कर दिया है, अब मेरा पुनर्जन्म न होगा।२
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१. निरवैरी निष्कामता साई सेती नेहु।
विषिया सू न्यारा रहै, संतन का अंग एह ॥
—साध, साषीभूत को अंग, कबीर ग्रंथावली, पृ० ५०
२ देवा बेनु बाजै गगन गाजै। सबद अनाहद बोलै।
अंतरि गति की जाने नाही। मूरिख भरमत डोलै ॥ टेक ॥
गगन मडल मै रहनि हमारी। सहजि सुनि गृह मेला।
अंतरि धुनि मै मन बिरमाऊँ। कोई जोगी गम लहैला ॥