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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 332 में से

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पृष्ठ 131

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३५
यह सत्संग विरक्त साधुओं की जमात नहीं है। यह गृहस्थ भक्तों का संगठन
है। उनको यह उत्पादक श्रम तथा अध्यात्म दोनों की शिक्षा देता है। प्रत्येक भक्त को
उत्पादक श्रम करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास सेना आदि भक्तों ने जीवन
पर्यंत अपना पेशेवर कार्य किया। नया वेदांत कर्म और अध्यात्म भावना का समन्वय
करता है। सत्संग इस समन्वय को मूर्त रूप देता है।
सत्संगति को भक्ति का प्रमुख साधन माना जाता है। अध्यात्म रामायण में
तो इसे प्रथम साधन कहा ही है। इस साधन को नामदेव ने विशेष महत्व दिया है।
उन्होंने अपनी रचनाओं में उसके आदर्शों का प्रतिपादन किया है।
संतों के सहवास के लिए नामदेव आतुर हैं। वे अपनी आंतरिक अभिलाषा इस
प्रकार व्यक्त करते है—आज मुझे कोई हरि का दास मिले तो परम सुख होगा। वह
मेरे मन में भाव-भगति जाग्रत करेगा, मेरे मन की दुविधा दूर करेगा तब आत्मज्ञान
का प्रकाश फैलेगा। नामदेव कहते हैं कि जब मेरा मन उदास रहता है तब संत समा-
गम से मुझे अपार सुख होता है।१
संसार में ऐसा भक्त विरला ही होता है। हे पंडितो ! तुम वेद तथा पुराणों
का अनुशीलन कर देखो। दही बिलोकर निकाला घृत फिर दही से एक रूप नहीं होता
अग्नि लकड़ी के जितने हिस्से को जलाती है वह फिर लकड़ी नहीं हो सकता। पारस
के स्पर्श से जो लोहा सोना बनता है वह फिर से लोहा नहीं हो सकता। पलाश चंदन
से बेढ़े जाने पर चंदन होता है। इसी प्रकार जो लोग निष्काम भाव से राम से लौ
लगाते हैं वे राम रूप हो जाते हैं।२
१. आज कोई मिलसो मुने राम सनेही।
तब सुख पावै हमारी देही ॥टेक॥
भाव भगति मन में उपजावै। प्रेम प्रीति हरि अंतरि आवै ॥१॥
आपा पर दुविधा सब नासै। सहजै आतम ग्यान प्रकासै ॥२॥
जनु नामा मन परा उदास। तब सुष पावै मिलै हरिदास ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०२
२. ऐसे जगथैं दास नियारा।
वेद पुरान सुमृत किन देखो पंडित करहु विचारा ॥ टेक ॥
दधि विलोइ जैसे घृत लीजे। बहुरि न एकठ थाई ॥
पावक दार जतन करि काढ्या, बहुरि न दार समाई ॥१॥
पारस परसि लोह जैसे कंचन बहुरि न म्यंछक होई।
आक पलास बेधीया चंदन, काष्ट कहै नही कोई ॥२॥