सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० नामदेव की हिन्दी कविता
के ढोर के समान कार्य करता है । १
कबीर साहब कहते हैं कि कथनी खाड के समान मीठी है परन्तु करनी अर्थात्
कृति प्रत्यक्ष जहर का घूंट है । मनुष्य यदि लंबी-चौड़ी बातें बनाना छोड़कर कृति को
महत्त्व दे तो विष का अमृत बन जाये । २
कबीर साहब ने अपनी एक साखी में बतलाया है कि वास्तव में 'सहजसील'
के ही अभ्यास में मेरे 'मत' का सार आ जाता है । इस 'सहजसील' का परिचय देते
हुए वे एक स्थान पर कहते हैं कि इसके लिए कम से कम सती, संतोषी, सावधान,
शब्दभेदी तथा सुविचारवान होने की आवश्यकता है जो सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार
कृपा पर निर्भर है । ३
इनमें से 'सुविचार' का गुण हमारे भीतर सारग्राहिता की भावना जागृत करता
है तथा उसी प्रकार कथनी और करनी के बीच सामंजस्य बनाये रखने का भी यत्न
करता है । इस प्रकार के सहजसील का अभ्यास निरंतर होना रहना चाहिये । इसके
सफल हो जाने पर ही हमें उस सहजावस्था की भी उपलब्धि हो जाती है जिसमें
'अपनी पांचो ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णत अपने कहने में आ जाती हैं और ऐसा प्रतीत होने
लगता है कि हमें स्वयं परमात्मा का ही स्पर्श अथवा प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है ।' ४
अब कथनी एवं करनी में कोई अंतर नहीं रह जाता । जैसा मुख से निकलता है वैसा
ही अपना दैनिक व्यवहार भी चलता है ।
संत रज्जब करनी तथा कथनी की एकरूपता पर बल देते हुए कहते हैं कि
औषधि बिना पथ्य के तथा पथ्य बिना औषधि का किस काम का ? यदि नामस्मरण
१. करता दीसे कीरतन ऊँचा करि करि तूँड ।
आगे बूझे कुछ नही योही आंधा रूँड ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
२. कथनी मीठी खांड सी करनी विष की सोय ।
कथनी तजि करनी करै विष तैं अमृत होय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ २४ ।
३. सती संतोषी सावधान सब्द भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थैं सहजसील मत सार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ६३ ।
४. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल ।
पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।