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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 332 में से

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पृष्ठ 127

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३१
और कृति में मेल न हो तो दोनो की प्रशंसा नही होती ।¹
मनुष्य भजन और साखी गाकर आनंदित होता है कि उसने ईश्वर की भक्ति
कर ली । लेकिन यह सब व्यर्थ है जब तक उस परम तत्व के नाम का ध्यान नही
किया । उसके कंठ में यम का फंदा अवश्य पड़ेगा ।²
भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता :
भक्ति और सांसारिक कार्यों को संतो ने अलग अलग नही समझा । भक्ति और
जीविका के कर्मों में कोई विरोध नही क्योकि भक्ति हृदय से होती है और कर्म हाथों
से । इसीलिए उन्होने श्रम और भक्ति दोनों को एक दूसरे का पूरक माना है। श्रम से
भक्ति सहज होती है और भक्ति से श्रम सहज । संतो ने नाम-स्मरण और श्रम साथ
साथ किया ।
इस प्रकार नामस्मरण और कर्म का समन्वय नये वेदांत की अद्वितीय विशेषता
है । कबीर³ भजन और बुनकरी, नामदेव भजन और दर्जी का काम, रैदास भजन
और मोची का काम, सेना भजन और नाई का काम साथ-साथ करते थे । रैदास ने⁴
अपनी समस्या का समाधान करते हुए कहा कि सब प्रतिवाद छोड़कर अहर्निश हरि
स्मरण करना चाहिए ।
प्राचीन वेदांत में भक्ति केवल साधन है, साध्य नही है । इसके विपरीत नया
वेदांत भक्ति को परम साध्य मानता है । यही एक मात्र सार वस्तु है। यह भजन है या
नाम की साधना है । भक्त निशि-दिन भजन करता है । इसका भजन अजपा जप है ।
१. ओषध बिना पथ्य का करै पथ्य बिना ओषधि आदि ।
यूँ सुमिरण सुकृत अमिल, उभे न पावहि दादि ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३४० ।
२. पद गाए मन हरषियां, साषी कहयां आनंद ।
सो तत नाव न जाणिया, गलमे पड़िया फंध ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
३. 'हम घरि सूतु तनहि नित ताना'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग आसा, पद २६ ।
'बूनि बुनि आप आपु पहिरावउ'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग भैरऊ, पद ७ ।
४. अहनिसि हरि सुमिरिये छांडि सकल प्रतिवाद ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ६६ ।