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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 332 में से

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पृष्ठ 137

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४१
सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार कृपा पर निर्भर है ।१
सब प्रकार की समाधियो में सहज समाधि को सर्वोत्तम एवं उत्कृष्ट कहा गया
है क्योकि इसमें साधक को आसन, मुद्रा, प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि क्लिष्ट साधना
करने की आवश्यकता नही होती । योग-युक्ति के द्वारा मन को अन्तर्मुखी किया जाता
है । मन केन्द्रीभूत हो जाने पर अपने विकारों से शून्य हो जाता है । केन्द्रीभूत मन
सहजवृत्ति में परिवर्तित हो जाता है । मन साधना की उत्कृष्ट अवस्था सहज समाधि है ।
इसमे मन की सभी वृत्तियां अन्तर्मुखी होकर अन्तर्निहित हो जाती हैं ।
संतों के अनुसार जिस साधना के लिए विशेष प्रयत्न नही करना पडता वही
साधना सहज साधना है ।२
दादू इस सहज साधना के लिए सुमिरन का मार्ग बताते हैं ।३
कबीर कहते है कि ईश्वर प्राप्ति को सभी सरल बताते है लेकिन उस सरल को
जानता कोई नही । जिन भक्तो को सरलतापूर्वक ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है उसी को
वास्तविक सहजावस्था कहते है ।४
कबीर अच्छी तरह जानते थे कि यह देनंदिन व्यवहार की दुनिया और साधारण
मानव जीवन कितना ही तुच्छ और हेय क्यो न हो यदि आत्मा-विस्मृतकारी परम
उल्लासमय साक्षात्कार किया जा सकता है तो इसी के द्वारा किया जा सकता है । वे
सगुण और निर्गुण के झगड़े को व्यर्थ बताते हैं । वे कहते हैं—हे संतो ! मे धोखे की
बात किस सें कहूँ ? गुण मे ही निर्गुण है और निर्गुण में गुण । इस सीधे रास्ते को
छोड़कर कहाँ बहता फिरता जाय ?५
१. सती संतोपी सावधान सबद भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थें, सहजसील मत सार ॥
--कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६३ ।
२. कहि कबीर राम नाम न छोड़ी सहजे होइ सु होइ रे ।
कबीर ग्रन्थावली, पृ० २६६ ।
३. साँसै साँस सम्हालना, इक दिन मिलि है आई ।
सुमिरन पेड़ा सहज का सतगुरु दिया बताय ॥
संत वाणी संग्रह भाग १, पृ० ७८ ।
४. सहज सहज सबको कहै, सहज न चीन्हे कोई ।
जिन्ह सहजैं हरिजी मिले, सहज कहीजै सोइ ॥
कबीर ग्रन्थावली, पृ० ४२ ।
५. संतों धोखा कासूं कहिये ।
गुण मे निरगुण निरगुंण मे गुंण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ।
कबीर ग्रन्थावली, पद १८०, पृ० १४६ ।