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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 332 में से

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पृष्ठ 136

१४० नामदेव की हिन्दी कविता
में उसकी प्राप्ति होती है । उसको सहज रूप समझने से वह सहज प्राप्त हो सकता है ।
उसको सुख अथवा दुख रूप समझने से सुख अथवा दुख में उसकी प्राप्ति हो सकती है ।
ज्ञान तथा ध्यान रूप समझने से वह ज्ञान तथा ध्यान रूप में प्राप्त हो सकता है । नाम-
देव कहते है—'यदि मैं कहूँ कि मैंने उसका साक्षात्कार कर लिया तो मैं झूठा और यदि
मैं कहूँ कि मैंने उसे नहीं देखा तो मेरा कथन सत्य से दूर होगा । जब मैं कहता हूँ कि
वह अगम है तो उसकी खोज निरर्थक है । तब उसके बारे में पूछना न पूछने के बराबर
ही है ।'¹
नामदेव अपनी मुक्तावस्था का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'हे देव ! तुम्हारा
डंका बजा । पखावज, वीणा आदि वाद्यों के मेल से एक ही सुर निकला । मेरे पैरों में
लोहे की बेड़ी पड़ी है । भव सागर का भय दूर हुआ । मुक्ति मेरी दासी हुई है । बकरी
जब सिंह को खाने लगी तब वह पीठ दिखाकर भागा । नामदेव कहते हैं कि मैंने बाहर
जाते हुए भीतर देखा और इस प्रकार अपनी भक्ति निभाई ।'²
संतों की दृष्टि में सहजशील की साधना ही उनके मत का सार है । इस सहज-
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