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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 332 में से

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पृष्ठ 140

१४४ नामदेव की हिन्दी कविता
इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियो से सम्बन्धित प्राणायाम को मैं रोक रखूँगा।
चन्द्र और नाड़ियो को सम कर मैं ब्रह्म की ज्योति में मिल जाऊँगा। १
योगी दीर्घ-जीवी होते हैं। उनका शासन दीर्घ काल तक चलता है। वह सांस
का निरोध कर उसको नीचे के भाग तक ले जाता है। और लबालब भरे हुए अमृत पात्र
से अमृत प्राशन करता है। नामदेव कहते हैं कि हे साधक ! तू सहज समाधि लगाकर
निरंजन की सेवा कर । २
अपने दिव्य अनुभव का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं। कि हे परमात्मा !
गुड्डी (पतंग) उडी और आकाश में समा गई। बोलने वाला डोरी में समा गया।
आवागमन का फेर मिट गया। यह गुडी कागज़ की नही है। उसने सहज आनंद की
प्राप्ति होती है। ३
हे विट्ठल ! भौंरे को कमलिनी प्राप्त नही होती अतः वह जनम जनम ठगा जाता
है। मेंढक कुमुदिनी के पास रहता है उसको उसका बुरा-भला कोई स्वाद नही मिलता।
पुष्प की सुगंध पर लुब्ध भ्रमर सो योजन का चक्कर काट कर आता है। पचासो
विषयो का त्याग करने पर भक्ति उत्पन्न होती है और फिर जन्म नही लेना पड़ता। ४
१. इडा पिंगला सुषमनि नारी। पवना भंषि रहाउँगा।
चंद सूर दोउ समि करि राखूँ। ब्रह्म ज्योति मिलि जाऊँगा।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६।
२. जोगी जन ग्याइ जुगे जुगि जीवै।
आकाश बाँधि पाताल चलावै आप भरे भरि पीवै ॥ टेक ॥
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रै॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६७।
३. देवा आज गुडी सहज उडी, गगन माँहि समाई।
बोलनहारा डोरी समांना। नही आवै नही जाई।
कागद थैं रहित गुडी। सहज आनन्द होई॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७७।
४. वीठला भैंवरा कँवल न पावै। ताथै जन्म जन्म डहरूावै ॥ टेक ॥
दादुर एक बसै पहवणितलि। स्वाद कुस्वाद न पावै।
पहप वास का लुब्धौ भौरा। सो जोजन फिरि आवै ॥ १ ॥
उपजी भगति पचीसूँ परिहरि। बहोरि जन्म नही आवै।
अखंड मंडल निराकार मैं। दास नामदेव गावै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७८।