सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४३
उपासनाएँ थी। तांत्रिक उपासनाएँ लोकविरोधी होने के कारण संतों को कभी ग्राह्य न
न हो सकी। इसका कारण सम्भवतः यही है कि संत अपनी मूल विचारधारा में समस्त
धर्म साधनाओ के विकृत एवं जटिल रूप को बाह्याचार ही समझते थे। डॉ० हजारी-
प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की साधना पद्धति पर दृष्टिपात करते हुए एक स्थल पर ठीक ही
लिखा है कि कबीर यौगिक क्रियाओ को भी बाह्याचार ही मानते थे। वे उन सारी
क्रियाओं को सहजावस्था की प्राप्ति का कारण नही मानते थे।¹ यही कारण है कि संत
योग की साधनाओ को अपनी साधना का मूल हेतु न मान सके। स्वयं कबीर अनहद का
बजना स्वीकार तो करते है पर वही एक परम सत्य नहीं है, सत्य है उसे बजाने
वाला।²
संतो मे हठयोग का क्लिष्ट रूप नही मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग
के जटिल रूप का वर्णन केवल परम्परा निर्वाह मात्र है। यथार्थ में तो मन, वायु तथा
बिंदु की साधना में से किसी एक ही साधना को जब नाथ पंथियो ने स्वीकार कर लिया
तब संतों ने चंचल मन को प्राणायाम की क्रियाओं से अपने अधीन करने के लिए योग
की मूल स्थिति को स्वीकार कर लिया। योग की परिभाषा भी चित्तवृत्तियों के निरोध
को लेकर चलती है।³
हठयोग की भावना संतों में बहुत पहले से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। योगो विसोबा खेचर से दीक्षा लेने के उपरांत प्रतीत होता है कि नामदेव
कुंडलिनी योग साधना में प्रवृत्त हुए और तभी से उनके पदो तथा अभंगो में उसका
उल्लेख होने लगा। नामदेव कहते है—
जहाँ ब्रह्मनाद रूपी सूर्य का प्रकाश है वहाँ संसार के सूर्य, चन्द्रमा आदि दीपक
धूमिल हो जाते है, गुरु-कृपा से मैने उसको जान लिया है। नामदेव कहते है कि इसके
फलस्वरूप मुझ जैसा भक्त भगवान के सहज रूप में समा गया है।⁴
१. कबीर—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६३ ।
२. वाजे जंत्र नाद धुनि होई। जो बजावै सो औरे कोई।
बाजो नाचै कौतिग देखा। जो नचावै सो कितहु न पेखा॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३१।
३. योगश्चित्तवृत्ति निरोधः । योग दर्शन १, २।
४. जह अनहत सूर उजारा। तह दीपक जले छंछारा।
गुरु परसादी जानिआ। जनु नामा सहज समानिआ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २००।