सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
४ सहजो बाई
अभय दान दीनन कूँ दीन्हे । देखत आप सरीखे कीन्हे ॥
गुरु को किरपा अपरम्पारै । गुन गावत मम रसना हारै ॥
सेस सहस मुख निस दिन गावै । गुरु अस्तुति का अन्त न पावै ॥
मौन गहूँ अस्तुति कहा करूँ । बार बार चरनन सिर धरूँ ॥
चरनदास महिमा अधिकाई । सबेस वारे सहजो बाई ॥१४॥
गुरु मारग
॥ दोहा ॥
गुरु मग दृढ़ पग राखिये, डिगमिग डिगमिग छाँड ।
सहजो टेक टरै नहीं, सूर सती ज्यों माँड ॥१५॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के प्रेम पन्थ सिर दीजै । आगा पोछा कबहुँ न कीजै ॥
गुरु के पन्थ होय सो होई । मारग आन चलौ मत कोई ॥
गुरु के पन्थ पैज१ का पूरा । गुरु के पन्थ चलै सो सूरा ॥
गुरु के पन्थ चलै सो जोधा । गुरु के पन्थ चलै का बोदा ॥
गुरु के पन्थ नहीं ठग लागै । गुरु के पन्थ कपट भय भागै ॥
गुरु के पन्थ मुकित उजियारा । गुरु के पन्थ नहीं संसारा ॥
गुरु के पन्थ मिटै दुख दोई । गुरु के पन्थ महा सुख होई ॥
चरनदास कौ पन्थ दुहेला । गुरमुख चालै ताहि सुहेला ॥
गुरु के पन्थ चलै सतबादी । सहजो पावै भेद अनादी ॥१६॥
गुरु चरन
॥ दोहा ॥
अठसठ तीरथ गुरु चरन, परबी होत अखंड ।
सहजो ऐसा धाम नहिं, सकल अंड ब्रह्मांड ॥१७॥
सब तीरथ गुरु के चरन, नित ही परबी होय ।
सहजो चरनोदक लिये, पार रहत नहिं कोय ॥१८॥
(१) टेक ।
गुरु आज्ञा ५
॥ चौपाई ॥
सब तीरथ गुरु चरनन लारे। चरन बर्त दृढ़ सदा हमारे॥
चरन कँवल की निसदिन पूजा। परसूँ और देव नहिं दूजा॥
इष्ट हमारे गुरु के चरना। गुरु के चरन ध्यान हूँ करना॥
गुरु के चरन लगे सो तारे। गुरु के चरन प्रान सूँ प्यारे॥
आसा मनसा और करमना। गुरु के चरन प्रेम चित धरना॥
गुरु के चरन होय सो होना। हानि लाभ कै दुख सुख मरना॥
रनजीता¹ गुरु चरन तुम्हारे। जोवन प्रान अधार हमारे॥
गुरु के चरन मुक्ति फलदायक। सहजो गुरुके चरन सहायक ॥१९॥
॥ दोहा ॥
गुरु पग निश्चै परसिये, गुरु पग हिरदे राख।
सहजो गुरुपग ध्यान करि, गुरु बिन और न भाख ॥२०॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के चरन कँवल चित राखूँ। आठसिद्धि नौ निधि सब नाखूँ॥
सकल पदारथ गुरु पग माहीं। गुरु पग परसे सब दुख जाहीं॥
गति मति पलटे गुरु पग परसे। गुरु पग परसे त्रिभुवन दरसै॥
गुरु पग परसे ब्रह्म विचारै। गुरु पग परसे माया छाँड़ै॥
गुरु पग परसे जोग जुगन्ता। गुरु पग परसे जीवन मुक्ता॥
गुरु पग परसे बन्धन छूटै। मोह ममत की फाँसी टूटै॥
गुरु पग परसे हरि पद पावै। रहै अमर ह्वै गर्भ न आवै॥
चरनदास पग महिमा भारी। बार बार सहजो बलिहारी ॥२१॥
गुरु आज्ञा
॥ दोहा ॥
गुरु आज्ञा दृढ़ करि गहै, गुरु मत सहजो चाल।
रोम रोम गुरु को रटै, सो सिष होय निहाल ॥२२॥
(१) चरनदास जी का घरऊ नाम ।
६ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
गुरु की अज्ञा दृढ़ करि गहिये। गुरु की अज्ञा ही में रहिये ॥
गुरु अज्ञा बिन काज न कीजै। हानि होय तो होने दीजै ॥
गुरु की अज्ञा बिघ्न न कोई। गुरु की अज्ञा गुरुमुख होई ॥
गुरु की अज्ञा भक्ति बढ़ावै। गुरु की अज्ञा पार लँघावै ॥
गुरु की अज्ञा सकल सिरोमन। गुरु की अज्ञा चलै सो हरिजन ॥
गुरु अज्ञा मानै सोइ साधू। गुरु अज्ञा पद भेद अगाधू ॥
जो कोइ गुरु की अज्ञा भूलै। फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
चरनदास गुरु अज्ञा पूरी। बिन अज्ञा करनी सब कूरी ॥
अज्ञाकारी गुरुमुख नीके। सहजो लोक भोग सब फीके ॥२३॥
गुरु बिमुख
॥ दोहा ॥
गुरु अज्ञा मानै नहीं, गुरुहि लगावै दोष।
गुरु निन्दक जग में दुखो, मुए न पावै मोष ॥२४॥
॥ चौपाई ॥
ऐसों का दरसन नहिं लीजै। चर्चा बात गोष्टि नहिं कीजै ॥
उनका संग करै जो कोई। बेमुख निगुरा निन्दक होई ॥
गुरु-दोषी की गति मति गाऊँ। अपने मनहीं कूँ समझाऊँ ॥
उनकी चौरासी नहिं छूटै। काल जाल जम जोरा लूटै ॥
फिर फिर जूनो संकट आवै। गर्भ बास में बहु दुख पावै ॥
जग में पात बगूला जैसे। जीवत प्रेत निसाचर ऐसे ॥
मन मैला तन सदा उदासी। गल में डिम्भ कपट की फाँसी ॥
सहजो तिन तें दूरहि भाजै। नाम लेत मम रसना लाजै ॥२५॥
॥ दोहा ॥
जो कुछ करै तो मनमुखी, मेटै गुरुमुख रीत।
भेद बचन समझै नहीं, चलै चाल बिपरीत ॥२६॥
गुरु शब्द ७
साध कहावै आप कूँ, चलै दुष्ट की चाल ।
बाद लिये फूला फिरै, बहुत बजावै गाल ॥२७॥
॥ चौपाई ॥
बेमुख बिषई ज्ञान उचारै । पाँचो जीत न मन कूँ मारै ॥
दारा सुत कूँ हरि गुरु जाने । तन मन विषय बास लिपटाने ॥
पाप पुन्य कूँ झूठ बतावै । परनारी परधन चित लावै ॥
महा अजोगी जोग न ठानै । छल बल झूठ कपट सिध मानै ॥
साध संत कूँ ठगिया जानै । राम भक्ति कूँ तुच्छ बखानै ॥
ऐसे अपराधी मति मारे । तृस्ना काम क्रोध के जारे ॥
डूबे लोभ लहर के माहीं । सुपने छिमा सील चित नाहीं ॥
हिंसा अंकुस लिये दुखदाई । मुख देखै नहिं सहजो बाई ॥२८॥
गुरु शब्द
॥ दोहा ॥
गुरू बचन हियरे धरै, ज्यों किर्पिन के दाम ।
भुमि गड़े माथे दिये, सहजो लहै तो राम ॥२६॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के सब्द हिये बिच धारै । गुरुमुख गुर के सब्द सम्हारै ॥
तीन लोक जम जोरा लूटै । गुरु के सब्द बिना नहिं छूटै ॥
मोह नींद में सब नर पागे । गुरु के सब्द बिना नहिं जागे ॥
गुरु के सब्द स्रवन जो जावै । छूटै कुबुधि परम गति पावै ॥
गुरु के सब्द प्रेम उजलावैं । गुरु के सब्द हरि आन मिलावै ॥
गुरु के सब्द जीव बुधि नासैं । गुरु के सब्द अभय पद भासैं ॥
गुरु के सब्द राह सोइ चलना । बेद पुरान कहा लै करना ॥
चरनदास गुरु सब्द तुम्हारे । हमरे भर्म फन्द सब जारे ॥
गुन सब गुरु के बचनै माहीं । सहजो सिष जो बिसरै नाहीं ॥३०॥
८ सहजो बाई
उपदेश गुरुभक्ति का
॥ दोहा ॥
सिष का माना सतगुरु, गुरु झिड़कै लख बार ।
सहजो द्वार न छोड़िये, यही धारना धार ॥३१॥
गुरु दरसन कर सहजिया, गुरु का कीजै ध्यान ।
गुरु की सेवा कीजिये, तजिये कुल अभिमान ॥३२॥
सतगुरु दाता सर्व के, तू किर्पिन कंगाल ।
गुरु महिमा जानै नहीं, फस्यौ मोह के जाल ॥३३॥
गुरु सूं कछु न दुराइये, गुरु सूं झूठ न बोल ।
बुरी भली खोटी खरी, गुरु आगे सब खोल ॥३४॥
सहजो गुरु रच्छा करैं, मेटैं सब दुख दुन्द ।
मन को जानैं सब गुरु, कहा छिपावै अन्ध ॥३५॥
गुरु महिमा
॥ दोहा ॥
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ॥३६॥
परमेसर सूं गुरु बड़े, गावत बेद पुरान ।
सहजो हरि के मुक्ति है, गुरु के घर भगवान ॥३७॥
अष्टादस और चार षट, पढ़ि पढ़ि अर्थ कराहिं ।
भेद न पावैं गुरु बिना, सहजो सब भर्माहिं ॥३८॥
सकल बिकल सब छोड़ कर, गुरु चरनन चित लाव ।
सहजो निस्चै हरि जपो, बहुर न ऐसो दाव ॥३९॥
दीपक ले गुरु ज्ञान को, जगत अँधेरे माहिं ।
काम क्रोध मद मोह में, सहजो उरझै नाहिं ॥४०॥
सहजो गुरु परताप सूं, होय समुन्दर पार ।
बेद अर्थ गूँगा कहै, बानो कितइक बार ॥४१॥
प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु-महिमा, नाम-सुमिरन व साधु-लक्षण)
गुरु महिमा ६
सहजो सतगुरु के मिले, भये और सूँ और ।
काग पलट गति हंस ह्वै, पाई भूली ठौर ॥४२॥
सहजो यह मन सिलगता, काम कोध की आग ।
भली भई गुरु ने दिया, सील छिमा का बाग ॥४३॥
निस्चै यह मन डूबता, मोह लोभ की धार ।
चरनदास सतगुरु मिले, सहजो लई उबार ॥४४॥
ज्ञान दीप सतगुरु दियौ, राख्यो काया कोट ।
साजन बसि दुर्जन भजे१, निकस गई सब खोट ॥४५॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार ।
तीन लोक दृष्टा भये, मिट्यौ भरम अँधियार ॥४६॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, नैना भये अनन्त ।
आदि अन्त मध एक ही, सूझि पड़े भगवन्त ॥४७॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, देख्यौ आतम रूप ।
तिमिर गयौ चाँदन भयौ, पायौ परघट भूप ॥४८॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मेट्यौ मन सन्देह ।
रोम रोम सूँ प्रेम उठि, भींज गई सब देह ॥४६॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, एक कह्यौ परसंग ।
तन मन तें पलटी गई, रंगी प्रेम के रंग ॥५०॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मूँद लिये दोउ नैन ।
फिर मो सूँ ऐसे कही, समझ लेहि यह सैन ॥५१॥
सहजो गुरु किरपा करी, कहा कहूँ मैं खोल ।
रोम रोम फुल्लित भई, मुखे न आवै बोल ॥५२॥
चिंउटी जहाँ न चढ़ि सकै, सरसों ना ठहराय ।
सहजो कूँ वा देस में, सतगुरु दई बसाय ॥५३॥
(१) भागे ।
१० सहजो बाई
सिष पौधा नौधा अभी, गुरु किरपा की बाड़ ।
सहजो तरवर फैल बड़, सुफल फलै वह झाड़ ॥५४॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे माटी मोय ।
आपा सौंपि कुम्हार कूँ, जो कछु होय सो होय ॥५५॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे चकई डोर ।
गुरु फेरै त्यौं ही फिरै, त्यागै अपना खोर१ ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे धोबी होय ।
दै दै साबुन ज्ञान का, मलमल डारै धोय ॥५७॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, मेटै मन सन्देह ।
नीच ऊँच देखै नहीं, सब पर बरसै मेह ॥५८॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे सूरज धूप ।
सब जीवन कूँ चाँदना, कहा रंक कहा भूप ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, समदृष्टी निर्लोभ ।
सिष कूँ प्रेम समुद्र में, करदे झोबाझोब ॥६०॥
सहजो गुरु बहुतक फिरैं, ज्ञान ध्यान सुधि नाहिं ।
तार सकैं नहिं एक कूँ, गहैं बहुत की बाहिं ॥६१॥
ऐसे गुरु तो बहुत हैं, धूत धूत धन लेहिं ।
सहजो सतगुरु जो मिलैं, मुक्ति धाम फल देहिं ॥६२॥
कुटंब जाल जित तित रुप्यो, पसु पंछी नर माहिं ।
सहजो गुरुबर्ती बचै, निगुरे अरुझत जाहिं ॥६३॥
बार बार नाते मिलैं, लख चौरासी माहिं ।
सहजो सतगुरु ना मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ॥६४॥
जन्म जन्म हरि संग ही, मिलि रह्यो आठो जाम ।
सहजो गुरु के बिन मिले, पायौ ना बिसराम ॥६५॥
(१) रास्ता, आदत ।
साध महिमा ११
सहजो गुरु पूरा मिलै, सिष मैला घट चित्त ।
मेह बरसै कालर१ जिमीं, खेत न उपजै खित्त२ ॥६६॥
मलयागिरि के निकट जो, सब द्रुम चंदन होहिं ।
कीकर सीसों चीड़ बृछ, हुए न कबहूँ होहिं ॥६७॥
सिष माटी सिष पाथरा, सिष लकड़ी सम जोय ।
सहजो गुरु पारस लगे, कैसे कंचन होय ॥६८॥
सिष्य सराई३ तेल बिन, बाती भी नहिं माहिं ।
सहजो गुरु दीपक मिलै, चाँदन होसी नाहिं ॥६९॥
सहजो गुरु समरथ कला, सर्बदेसी सर्ब अंग ।
कोइ कैसा ही सिष्य हो, सब पर गेरै रंग ॥७०॥
सहजो गुरु रँगरेज सा, सबहीं कूँ रँग देत ।
जैसा तैसा बसन है, जो कोइ आवै सेत ॥७१॥
सहजो गुरु दरसन दियो, पूर रहे सब ठौर ।
जहाँ तहाँ गुरु ही लखै, दृष्टि न आवै और ॥७२॥
देखत ही आनंद भये, सतगुरु पहुँचे आय ।
भवसागर दुख रूप सूँ, सहजो लई बचाय ॥७३॥
चरनदास के चरन पर, सहजो वारै प्रान ।
जगत ब्याध सूँ काढ़ि कर, राख्यो पद निरबान ॥७४॥
सहजो गुरु महिमा कही, पढ़ सुनि हिया सिराय४ ।
उपजै गुरु की भक्ति दृढ़, दुबिधा दुर्मति जाय ॥७५॥
साध महिमा
॥ दोहा ॥
साध मिले गुरु पाइया, मिटि गये सब सन्देह ।
सहजो कूँ सम ही भयो, कहा गिरवर कहा गेह ॥ १ ॥
(१) कल्लर = ऊसर । (२) पृथ्वी । (३) दिया या दीवा । (४) ठंडा होय ।
ही करते घात ॥१३॥`
- Wait, "जम ही करते घात" - is it 'जम'?
- Yes, 'जम' (यमरूप / यमराज).
- Sakhi 14:
सहजो संगत साध की, छूटै सकल बियाध ।- "सहजो संगत साध की, छूटै सकल बियाध ।"
- Wait, there is a comma after की:
की,.
दुर्मति पाप रहै नहीं, लागै रंग अगाध ॥१४॥- "दुर्मति पाप रहै नहीं, लागै रंग अगाध ॥१४॥"
-
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१२ सहजो बाईVerse lines:
साध मिले पूरी भई, जनम जनम की आस ।
सहजो पायौ भाव तें, सतसंगत में बास ॥ २ ॥
सहजो साधन के मिले, मन भयो हरि के रूप ।
चाह गई थिरता भई, रंक लख्यौ सोइ भूप ॥ ३ ॥
साध मिले हरि ही मिले, मेरे मन परतीत ।
साध लक्षण १३
साध बृच्छ बानी कली, चर्चा फूले फूल ।
सहजो संगत बाग में, नाना फल रहे झूल ॥१५॥
सहजो दरसन साध का, दो नैनों भरि लेहि ।
तिहूँ ताप नसि जायँगे, सीतल होगो देहि ॥१६॥
सहजो दरसन साध का, देखूँ वारूँ प्रान ।
जिन की किरपा पाइये, निर्भय पद निर्बान ॥१७॥
दुष्ट लक्षण
॥ दोहा ॥
दुष्टन की महिमा कहूँ, सुनियो संत सुजान ।
ताना दै दै दृढ़ करें, भक्ती जोग अरु ज्ञान ॥१८॥
॥ चौपाई ॥
धन दुष्टी जो दृढ़ता देई । निन्दा कर पातक हरि लेई ॥
दुष्टी त्यागी दीखै भारी । समझ सोच सहजो बलिहारी ॥
तज दइ साध संग गुरु चरना । त्यागी भक्ति ध्यान का धरना ॥
त्यागी उत्तम रहनी गहनी । त्यागी हरि की लीला कहनो ॥
त्यागे बचन बिमल सुखदाई । तजि दियो साँच झूठ लौ लाई ॥
जत सत सील छिमा तजि दीन्हा । सो साधू माथे धरि लीन्हा ॥
तजी दीनता सुबुधि चिताई१ । सो गरीब साधों ने पाई ॥
तजि बैराग परम संतोषा । सब बिधि तज्यो राम गति मोषा ॥१९॥
॥ दोहा ॥
भली चाल दुष्टी तजै, ऐसा त्यागा होय ।
बुरी चाल साधू तजै, तजन कहै सब कोय ॥२०॥
साध लक्षण
॥ चौपाई ॥
साध सोई जो काया साधै । तजि आलस और बाद बिबादै ॥
गहै धारना सब गति भारी । तजै बिकलता अस्तुति गारी ॥
छिमावन्त धीरज कूँ धारै । पाँचो बस करि मन कूँ मारै ॥
(१) सावधानता ।
१४ सहजो बाई
त्यागै झूठ साँच मुख बोलै । चित इस्थिर इत उत ना डोलै ॥
तन जग में मन हरि के पासा । लोक भोग सूँ सदा उदासा ॥
जत सत नख सिख सीतलताई । तन मन बचन सकल सुखदाई ॥
निर्गुन ध्यानी ब्रह्म गियानी । मुख सूँ बोलै अमृत बानी ॥
समझ एकता भाव न दूजे । जिनके चरन सहजिया पूजे ॥२१॥
॥ दोहा ॥
निर्द्वन्दी निर्बैरता, सहजो अरु निर्बास ।
सन्तोषी निर्मल दसा, तकै न पर को आस ॥२२॥
ज्ञान मध्य इस्थिर दसा, ध्यान मध्य गलतान ।
सहजो साधू राम के, तजैं बड़ाई मान ॥२३॥
जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरि नाम ।
जो बोलैं तो हरि कथा, भक्ति करैं निःकाम ॥२४॥
तन मन मेटैं खेद सब, तज उपाधि की चाल ।
सहजो साधू राम के, तज कनक और बाल१ ॥२५॥
दीर्घ बुद्धि जिनकी महा, सील सदा ही नैन ।
चेतनता हिरदे बसै, सहजो सीतल बैन ॥२६॥
तन कूँ साधे हो रहैं, चित कूँ राखैं हाथ ।
सहजो मन कूँ यौँ गहैं, चलै न इन्द्रिन साथ ॥२७॥
नित ही प्रेम पगे रहैं, छके रहैं निज रूप ।
समदृष्टी सहजो कहै, समझैं रंक न भूप ॥२८॥
सुरत नहीं ब्यौहार में, जगत रीत सूँ पीठ ।
सनमुख हैं गुरु भक्ति में, सहजो हरि के ईठ२ ॥२६॥
साध असंगी सँग तजैं, आतम ही को संग ।
बोध रूप आनन्द में, पियैं सहज को रंग ॥३०॥
(१) स्त्री । (२) इष्ट, प्यारे ।
द्वादस प्रकार के बचन साध के १५
दुर्जन ना साजन नहीं, नहीं बैर नहिं प्रोत ।
सकल बिकल उनके नहीं, सहजो हरि जन रोत ॥३१॥
सहजो हरि जन मुक्त हैं, डार दुई की पोट ।
चाह गई संसा मिटा, बंधन छूटे कोट ॥३२॥
राग द्वेष सूँ रहित हैं, बैरागी निरबन्ध ।
सहजो इच्छा ना रही, माथा ब्रह्म की संध ॥३३॥
आसन संजम साध करि, साधै प्रान अपान१ ।
सहजो मद्रा जौ सधै, तौ जोगो परवान ॥३४॥
तीनों बन्ध लगाय के, अनहद सुनै टकोर ।
सहजो सुन्न समाधि में, नहीं साँझ नहिं भोर ॥३५॥
ना सुख बिद्या के पढ़े, ना सुख बाद बिबाद ।
साध सुखी सहजो कहै, लागे सुन्न समाध ॥३६॥
मुए दुखी जोवत दुखी, दुखी भूख आहार ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ नित्त बिहार ॥३७॥
चाह दुखी आसा दुखी, महा दुखी अज्ञान ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ केवल ज्ञान ॥३८॥
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ॥३६॥
रंक दुखी राजा दुखी, दुखी सकल संसार ।
साध सुखी सहजो कहै, पाया भेद अपार ॥४०॥
ना सुख दारा सुत महल, ना सुख भूप भये ।
साध सुखी सहजो कहै, तृस्ना रोग गये ॥४१॥
द्वादस प्रकार के बचन साध के
१ मीठी बोली । ४ सीतल सुगन्ध बोली ७ बिघ्न-बिदार बोली १० भक्ति दृढ़ावन बोली
२ चरपरी बोली । ५ महाफूल बोली । ८ शुद्ध सुख सज्जन बोली ११ स्थिर बोली ।
३ अमृत-बचन बोली ६ सलिल बोली । ६ भर्म-निवारन बोली १२ साँची बोली ।
(१) प्राण और अपान वायुओं के नाम हैं—प्राण अंतर खिंचने वाली स्वासा को
और अपान बाहर चलने वाली स्वासा को कहते हैं, जिनको प्राणायाम के अभ्यास में
साधना पड़ता है ।
३
१६ सहजो बाई
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के
१ पाहन बोली । ४ अग्नि सरूप बोली । ७ खट्टी बोली । १० भरमिक बोली ।
२ काँटेदार बोली । ५ अकड़े खटक बोली । ८ कडुई दुर्गंध बोली । ११ निगुरी बोली ।
३ बिष भुवंग बोली । ६ हिया-बेध बोली । ९ झूठी बोली । १२ डिगमिगाट बोली
बैराग उपजावन का अंग
॥ दोहा ॥
सहजो भज हरि नाम कूँ, तजो जगत सूँ नेह ।
अपना तो कोइ है नहीं, अपनी सगी न देह ॥ १ ॥
यही कही गुरुदेवजू, यही पुकारैं सन्त ।
सहजो तज या जगत कूँ, तोहि तजैगो अन्त ॥ २ ॥
कलह कलपना दुख घना, सदा रहै मन भंग ।
अकस¹ भरे कूँ छोड़िये, सहजो जग बेढंग ॥ ३ ॥
जैसे सँड़सी लौह की, छिन पानी छिन आग ।
ऐसे दुख सुख जगत के, सहजो तू मत पाग ॥ ४ ॥
अचरज जीवन जगत में, मरिबो साँचो जान ।
सहजो अवसर जात है, हरि सूँ ना पहिचान ॥ ५ ॥
जग से या जग में पगा, जग संग दीन्हे प्रान ।
राम तजै जग सूँ रचै, सहजो निश्चय हान ॥ ६ ॥
झूठा नाता जगत का, झूठा है घर बास ।
यह तन झूठा देख कर, सहजो भई उदास ॥ ७ ॥
जब लग चावल धान में, तब लग उपजै आय ।
जग छिलके कूँ तजि निकस, मुक्ति रूप है जाय ॥ ८ ॥
कुटँब सँगाती बीच में, आदि अन्त नहिं होय ।
बीच मिले बिच ही गये, सहजो संग न कोय ॥ ९ ॥
सहजो स्वारथ सब लगे, दारा सुत औ बीर ।
जीवत जोतैं बैल ज्यों, मुए चढ़ावैं सोर² ॥१०॥
(१) बैर । (२) जीते जी तो कड़ी मेहनत लेते हैं और मरने पर अपने मतलब के लिए मन्नत
चढ़ाते हैं।
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बैराग उपावन का अङ्ग १७
कोई किसी के संग ना, रोग मरन दुख बन्ध ।
इतने पर अपनौ कहैं, सहजो ये नर अन्ध ॥११॥
दरद बटाय सकैं नहीं, मुए न चालैं साथ ।
सहजो क्योंकर आपने, सब नाते बरबाद ॥१२॥
मर बिछुड़ै जो कुटँब सूँ, बहुर न देखै आय ।
महल द्रव्य सन्तान कू, सहजो पचै बलाय ॥१३॥
मरि बिछुड़न यों होइगो, ज्यों तरवर सूँ पात ।
सहजो काया प्रान यों, मुख सेती ज्यों बात ॥१४॥
सहजो जीवत सब सगे, मुए निकट नहिं जायँ ।
रोवैं स्वारथ आपने, सुपने देख डरायँ ॥१५॥
सहजो धन माँगे कुटँब, गाड़ा धरा बताय ।
जो कछु है सो दे हमें, फिर पाछे मरि जाय ॥१६॥
मुख देखै ढाँपै भजै, तड़ दे तोड़े नेह ।
सहजो पति सुत निज हितू, जारि करेंगे खेह ॥१७॥
काढ़ काढ़ बेगी कहैं, भीतर बाहर लोय ।
जीव छुटे सहजो कहै, तन का सगा न कोय ॥१८॥
यह मन्दिर यह नारि है, यह धन यह सन्तान ।
तेरो ना सहजो कहै, काहे करत गुमान ॥१९॥
जन्म जुवा सों हारिहो, कियो न लाहा सूल ।
डार पात फल सींच कर, सहजो काटत मूल ॥२०॥
सहजो गुरु परताप सूँ, ऐसी जान पड़ी ।
नहीं भरोसा स्वास का, आगे मौत खड़ी ॥२१॥
भीतर का भीतर खुलै, कै बाहर खुलि जाय ।
देह खेह है जायगी, जैहौ जन्म गँवाय ॥२२॥
स्वासा दीपक के बुझे, होत अँधेरी देह ।
सहजो सूनी प्रान बिनु, जब कैसो हरि नेह ॥२३॥
१८ सहजो बाई
सहजो फिर पछितायगो, स्वास निकसि जब जाय ।
जब लग रहै सरीर में, राम सुमिर गुन गाय ॥२४॥
स्वास खजानो जातु है, ता की सोधो नाहिं ।
सहजो खर्चों का रह्यो, कर हिसाब घर माहिं ॥२५॥
सहजो नौबत स्वास की, बाजत है दिन रैन ।
मूरख सोवत है महा, चेतन कूँ नहिं चैन ॥२६॥
हिरनाकुस से ह्वै मिटे, दुर्जोधन सिसुपाल ।
कुंभकरन रावन गये, सहजो खाया काल ॥२७॥
निश्चै मरना सहजिया, जीवन की नहिं आस ।
क टूटी सी झोपड़ी, कै मन्दिर में बास ॥२८॥
कै गरीब सिर टोकरी, क सिर छत्तर होय ।
जन्म मरन में एक से, सहजो भाँति न दोय ॥२६॥
मरना है रहना नहीं, जाना वाही ठौर ।
सहजो कै कङ्गाल हो, कै हो द्रव्य कड़ोर ॥३०॥
आपन हूँ थिर होहिं जो, करै और को सोग ।
सहजो साथी नाव के, सभी बटाऊ लोग ॥३१॥
बैठि बैठि बहुतक गये, जग तरवर की छाँहिं ।
सहजो बटाऊ बाट के, मिलि मिलि बिछुड़त जाहिं ॥३२॥
यह रस्ता बहता रहै, थमै नहीं छिन एक ।
बहु आवैं बहु जातु हैं, सहजो आँखन देख ॥३३॥
जग देखत तुम जावगे, तुम देखत जग जाय ।
सहजो योंही रीति है, मत कर सोच उपाय ॥३४॥
मुए सो काया जारई, बहुरि न मिलिहै आय ।
रोये तें कहा होत है, सहजो झुरै बलाय ॥३५॥
झुरि झुरि के पिंजर भये, रोय गँवाये नैन ।
मरे गये सो ना मिले, सहजो सुने न बैन ॥३६॥
बैराग उपजावन का अंग १६
जो रोये सूँ बाहुरै, तौ रोवौ दिन रात।
तन छीजै वह न मिलै, सहजो कूड़ी बात ॥३७॥
काहे कूँ रोवत रहौ, कल्प न होवै काज।
सहजो मुए सो मरि गये, आवैं काल्ह न आज ॥३८॥
देह निकट तेरे पड़ी, जीव अमर है नित्त।
दुइ में मूवा कौन सा, का सूँ तेरा हित्त ॥३६॥
जो तेरा हित देह सूँ, नख सिख ताही¹ खंड।
जीव अमर सहजो कहै, ब्यापक और अखंड ॥४०॥
तेरा थानी क्यों मुवा, क्यों न रखा गहि बाहिं।
सहजो बहुतक मिलि छुटे, चौरासी के माहिं ॥४१॥
कभुवक तेरा बाप है, कभुवक तेरा पूत।
कभुवक तेरा मित्र है, कभुवक तेरा सूत² ॥४२॥
जो तेरे सँग प्यार था, जाता वाके साथ।
कै वाही कूँ राखता, सहजो गहि कर हाथ ॥४३॥
कलप रोय पछिताय थक, नेह तजौगे कूर।
पहिले ही सूँ जो तजै, सहजो सो जन³ सूर ॥४४॥
यों खाता यों सोवता, मीठे कहता बोल।
यह बिचार तू मत करै, चित रहै डाँवाडोल ॥४५॥
बैठि पहिरि यों चलता, बस्तर भूषण लाल।
यह बिचार तू मत करै, छल रूपी जग जाल ॥४६॥
आगे रो रो क्या किया, अब क्यों रोवै भाँड।
संग न आया ना चलै, यह जग झूठी माँड ॥४७॥
आगे मुए सो जा चुके, तू भी रहै न कोय।
सहजो पर कूँ क्या झुरै, आपन ही कूँ रोय ॥४८॥
(१) नाहीं। (२) शत्रु, दूत। (३) सावंत।
१० सहजो बाई
बहुत गई थोड़ी रही, यह भां रहसी नाहिं ।
जन्म जाय हरि भक्ति बिनु, सहजो झुर मन माहिं ॥४६॥
कर्म अनुसार योनि
॥ दोहा ॥
उपजि उपजि फिर फिर मरौ, जम दे दारुन दुक्ख ।
लाज नहीं सहजो कहै, धिर्ग तुम्हारो मुक्ख ॥५०॥
पसु पंछी नर सुर असुर, जलचर१ कीट पतंग ।
सबही उतपति कर्म की, सहजो नाना अंग ॥५१॥
कर्मन के प्रेरे फिरौ, जन्म जन्म दुख होय ।
मुक्ति बिचारो सहजिया, आवागवन जु खोय ॥५२॥
जन्म चलो ही जातु है, ये दिन आछे जाहिं ।
जीवत जागह ना करी, बैठोगे केहि ठांहि ॥५३॥
सहजो रहै मन बासना, तैसी पावै ठौर ।
जहाँ आस तहँ बास है, निस्चै करी कठोर ॥५४॥
देह छूटै मन में रहे, सहजो जैसी आस ।
देह जन्म जैसो मिलैँ, जैसे ही घर बास ॥५५॥
॥ चौपाई ॥
जा को आस रहै मन्दिर में। होकर घूँस बसै सो घर में ॥
रहै बासना द्रव्य मँझारा । जन्मै नाग होय पुनि कारा ॥
रहै बासना तिरिया माहीं। कोटी२ स्वान धरै तन आई ॥
रहै बासना पुर्षा बर की । कुतिया होय चूहड़े३ घर की ॥
जा की रहै पुत्र में आसा । सूवर जन्म नीच घर बासा ॥
जा का मन रहै राज दुवारे । हस्ती हो सिर मेलै छारे ॥
रहै बासना नीर पियासी । मीन देह धरि जल की बासी ॥
रहै बासना बाहन संगा । होय जन्म ले बाहन४ अंगा ॥
(१) थिरचर । (२) योनि । (
जन्म दशा २१
जहाँ बासना जित ही जाई । यह मत बेद पुरानन गाई ॥
चरनदास गुरु मोहिं बताई । तजो बासना सहजोबाई ॥
॥ दोहा ॥
सहजो लोक प्रलोक की, नहीं बासना ताहि ।
सो वह ब्रह्म सरूप है, सागर लहर समाय ॥५७॥
जा की गुरु में बासना, सो पावै भगवान ।
सहजो चौथे पद बसै, गावत बेद पुरान ॥५८॥
परमेसुर की बासना, अन्त समय मन माहिं ।
तन छूटै हरि कूँ मिलै, उपजै बिनसै नाहिं ॥५६॥
साध संग की बासना, जेहि घट पूरी सोय ।
मनुष जन्म सतसंग मिलै, भक्ति परापत होय ॥६०॥
सहजो हरि के नाम की, रहै बासना बीर ।
चौरासी संकट कटै, जम की छूटै पीर ॥६१॥
चौरासी काया पहिर, दुख सहे नाना त्रास ।
भली भई अब के कुसल, चरनदास की आस ॥६२॥
चौरासी के त्रास सुनि, जम किंकर की मार ।
सहजो आई गुरु सरन, सुमिरचो सिरजनहार ॥६३॥
धन जोबन सुख सम्पदा, बाहर की सी छाहँ ।
सहजो आखिर धूप है, चौरासी के माहँ ॥६४॥
चौरासी जोनी भुगत, पायौ मनुष सरीर ।
सहजो चूके भक्ति बिनु, फिर चौरासी पीर ॥६५॥
जन्म दशा
॥ दोहा ॥
जन्म मरन अब कहत हूँ, कहूँ अवस्था चार ।
चौरासी जमदंड कूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥६६॥
चरनदास आज्ञा दई, सहजो परगट गाय ।
ता सूँ पढ़ि सुनि जीव की, सकल बन्ध कटि जाय ॥६७॥
२२ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
पापी जीव गर्भ जब आवै । भवन अँधेरे बहु दुख पावै ॥
तल मूड़ी ऊपर को पाऊँ । मुख लिगी१ और बिष्टा ठाऊँ ॥
जठर अगिन इक रस जहँ लागी । अधिक तपै जहँ पतित अभागी ॥
खट्टा मीठा माता खावै । लागि छुरी सी बहु दुख पावै ॥
आप दुखो माता दुख पाया । दसें महीने जग में आया ॥
जग जंजाल देखकर रोया । नर नारी मिलि सभी बिगोया ॥
माया मोह पवन लगि भूला । सहजो गोद पालने झूला ॥
नाते सभी लगे उठि झूठे । पड़ा बन्ध में कैसे छूटे ॥६८॥
॥ दोहा ॥
सब नाते उठि उठि लगे, रोम रोम लिया बन्ध ।
सहजो यह भी रलि मिला, फिर फिर भूला अन्ध ॥६६॥
॥ चौपाई ॥
कोई कहै मैं इसकी माई । कोई कहै लाला की दाई ॥
कोई कहै यह सुन्दर हीरा । गोद खेलाऊँ अपना बीरा ॥
कोई कहै में या का बापू । बालक पाया पुत्र प्रतापू ॥
कोई कहै मैं या की बूवा । चाचा कहै भतीजा हूवा ॥
कोई कहै यह मेरा भाई । कोई कहै मैं दादी आई ॥
कोई कहै मैं मा की बहिनी । कोई कहै मैं या की नानी ॥
कोई कहै मैं इसका मामा । लाया खाँड़ खड़ूले जामा ॥
कोई कहै मैं या का नाना । मामी ने भांजा करि जाना ॥
कोई कहै यह पोता बाल२ । कोई कहै यह मेरा लाल३ ॥७०॥
॥ दोहा ॥
सब नाते लिये मान कर, घेरा घेरी घेर ।
झूठे साँचे से लगैं, सुपने कंचन मेर४ ॥७१॥
(१) मूत्र या पेशाब । (२) बाला । (३) साला । (४) पहाड़ ।
जन्म दशा २३
पित्र देवता गोतिया, गरह नछत्तर सौन १।
सहजो बन्धन बँधि गये, ताहि छुड़ावै कौन ॥७२॥
॥ चौपाई ॥
गूँगा घी कहना जब सोखा। सेढू नाम मदारी भीखा ॥
माय बाप ले नाम पुकारैं। जब किलकौ तब तन मन वारैं ॥
मुख चुमैँ और कंठ लगावै। देवी देवा बहुत मनावैं ॥
रोग होय तो बहु दुख पावैं। ले ले जहाँ तहाँ पग धावैं ॥
कबहूँ झरि पिंजर है जावै। कबहूँ खाँसी बहुत सतावै ॥
चलै पेट कबहूँ बहु रोवै। खीजै बहुत नेक नहिं सोवै ॥
ज्वर कबहूँ दुखै दोउ नैना। पुनः पुनः२ दुख लहै न चैना ॥
निकसै दाँत दाढ़ दुख भैया। जबसूँ जन्म सदा दुख पैया ॥७३॥
॥ दोहा ॥
दुक्ख सुख बढ़ने लगा, पाँच बरस भइ देह।
जब पढ़ने बैठाइया, अपनी बिद्या लेह ॥७४॥
॥ चौपाई ॥
बालक का चित खेल मँझारे। ज्यौं ज्यौं पाधा छड़ियन मारै ॥
बैठि रहै तौ पकड़ बुलावै। बाँधि बाँधि दुख देत पढ़ावै ॥
मन ही मन सोचै दुख भारी। दुर्जन भये बाप महतारी ॥
दुख दे दे कर बहुत पढ़ाया। खोट कपट में घना सँधाया ॥
ऐसे भया बरस द्वादश का। रहा नहीं उनहूँ के बस का ॥
मन में आवै सो पुनि करई। मात पिता सूँ नेक न डरई ॥
खेलै खेल बहुत परकारा। सबही बिधि लड़कापन हारा ॥
बालपना हस खेल गँवाया। गुरु की टहल सरन नहिं ओया ॥
पाप पुन्न कूँ ना पहिचाना। सहजो कर्ता राम न जाना ॥७५॥
(१) शायद "सरवन" से मतलब है जो बड़े भारी भक्त मां बाप के थे और उनको
बहँगी पर लिये फिरते थे। इनका चित्र सावन में लोग दीवार पर लिख कर पूजते हैं।
(२) बार-बार।