सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजन्म दशा २३
पित्र देवता गोतिया, गरह नछत्तर सौन १।
सहजो बन्धन बँधि गये, ताहि छुड़ावै कौन ॥७२॥
॥ चौपाई ॥
गूँगा घी कहना जब सोखा। सेढू नाम मदारी भीखा ॥
माय बाप ले नाम पुकारैं। जब किलकौ तब तन मन वारैं ॥
मुख चुमैँ और कंठ लगावै। देवी देवा बहुत मनावैं ॥
रोग होय तो बहु दुख पावैं। ले ले जहाँ तहाँ पग धावैं ॥
कबहूँ झरि पिंजर है जावै। कबहूँ खाँसी बहुत सतावै ॥
चलै पेट कबहूँ बहु रोवै। खीजै बहुत नेक नहिं सोवै ॥
ज्वर कबहूँ दुखै दोउ नैना। पुनः पुनः२ दुख लहै न चैना ॥
निकसै दाँत दाढ़ दुख भैया। जबसूँ जन्म सदा दुख पैया ॥७३॥
॥ दोहा ॥
दुक्ख सुख बढ़ने लगा, पाँच बरस भइ देह।
जब पढ़ने बैठाइया, अपनी बिद्या लेह ॥७४॥
॥ चौपाई ॥
बालक का चित खेल मँझारे। ज्यौं ज्यौं पाधा छड़ियन मारै ॥
बैठि रहै तौ पकड़ बुलावै। बाँधि बाँधि दुख देत पढ़ावै ॥
मन ही मन सोचै दुख भारी। दुर्जन भये बाप महतारी ॥
दुख दे दे कर बहुत पढ़ाया। खोट कपट में घना सँधाया ॥
ऐसे भया बरस द्वादश का। रहा नहीं उनहूँ के बस का ॥
मन में आवै सो पुनि करई। मात पिता सूँ नेक न डरई ॥
खेलै खेल बहुत परकारा। सबही बिधि लड़कापन हारा ॥
बालपना हस खेल गँवाया। गुरु की टहल सरन नहिं ओया ॥
पाप पुन्न कूँ ना पहिचाना। सहजो कर्ता राम न जाना ॥७५॥
(१) शायद "सरवन" से मतलब है जो बड़े भारी भक्त मां बाप के थे और उनको
बहँगी पर लिये फिरते थे। इनका चित्र सावन में लोग दीवार पर लिख कर पूजते हैं।
(२) बार-बार।