सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबैराग उपजावन का अंग १६
जो रोये सूँ बाहुरै, तौ रोवौ दिन रात।
तन छीजै वह न मिलै, सहजो कूड़ी बात ॥३७॥
काहे कूँ रोवत रहौ, कल्प न होवै काज।
सहजो मुए सो मरि गये, आवैं काल्ह न आज ॥३८॥
देह निकट तेरे पड़ी, जीव अमर है नित्त।
दुइ में मूवा कौन सा, का सूँ तेरा हित्त ॥३६॥
जो तेरा हित देह सूँ, नख सिख ताही¹ खंड।
जीव अमर सहजो कहै, ब्यापक और अखंड ॥४०॥
तेरा थानी क्यों मुवा, क्यों न रखा गहि बाहिं।
सहजो बहुतक मिलि छुटे, चौरासी के माहिं ॥४१॥
कभुवक तेरा बाप है, कभुवक तेरा पूत।
कभुवक तेरा मित्र है, कभुवक तेरा सूत² ॥४२॥
जो तेरे सँग प्यार था, जाता वाके साथ।
कै वाही कूँ राखता, सहजो गहि कर हाथ ॥४३॥
कलप रोय पछिताय थक, नेह तजौगे कूर।
पहिले ही सूँ जो तजै, सहजो सो जन³ सूर ॥४४॥
यों खाता यों सोवता, मीठे कहता बोल।
यह बिचार तू मत करै, चित रहै डाँवाडोल ॥४५॥
बैठि पहिरि यों चलता, बस्तर भूषण लाल।
यह बिचार तू मत करै, छल रूपी जग जाल ॥४६॥
आगे रो रो क्या किया, अब क्यों रोवै भाँड।
संग न आया ना चलै, यह जग झूठी माँड ॥४७॥
आगे मुए सो जा चुके, तू भी रहै न कोय।
सहजो पर कूँ क्या झुरै, आपन ही कूँ रोय ॥४८॥
(१) नाहीं। (२) शत्रु, दूत। (३) सावंत।