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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

१६ सहजो बाई
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के
१ पाहन बोली । ४ अग्नि सरूप बोली । ७ खट्टी बोली । १० भरमिक बोली ।
२ काँटेदार बोली । ५ अकड़े खटक बोली । ८ कडुई दुर्गंध बोली । ११ निगुरी बोली ।
३ बिष भुवंग बोली । ६ हिया-बेध बोली । ९ झूठी बोली । १२ डिगमिगाट बोली
बैराग उपजावन का अंग
॥ दोहा ॥
सहजो भज हरि नाम कूँ, तजो जगत सूँ नेह ।
अपना तो कोइ है नहीं, अपनी सगी न देह ॥ १ ॥
यही कही गुरुदेवजू, यही पुकारैं सन्त ।
सहजो तज या जगत कूँ, तोहि तजैगो अन्त ॥ २ ॥
कलह कलपना दुख घना, सदा रहै मन भंग ।
अकस¹ भरे कूँ छोड़िये, सहजो जग बेढंग ॥ ३ ॥
जैसे सँड़सी लौह की, छिन पानी छिन आग ।
ऐसे दुख सुख जगत के, सहजो तू मत पाग ॥ ४ ॥
अचरज जीवन जगत में, मरिबो साँचो जान ।
सहजो अवसर जात है, हरि सूँ ना पहिचान ॥ ५ ॥
जग से या जग में पगा, जग संग दीन्हे प्रान ।
राम तजै जग सूँ रचै, सहजो निश्चय हान ॥ ६ ॥
झूठा नाता जगत का, झूठा है घर बास ।
यह तन झूठा देख कर, सहजो भई उदास ॥ ७ ॥
जब लग चावल धान में, तब लग उपजै आय ।
जग छिलके कूँ तजि निकस, मुक्ति रूप है जाय ॥ ८ ॥
कुटँब सँगाती बीच में, आदि अन्त नहिं होय ।
बीच मिले बिच ही गये, सहजो संग न कोय ॥ ९ ॥
सहजो स्वारथ सब लगे, दारा सुत औ बीर ।
जीवत जोतैं बैल ज्यों, मुए चढ़ावैं सोर² ॥१०॥
(१) बैर । (२) जीते जी तो कड़ी मेहनत लेते हैं और मरने पर अपने मतलब के लिए मन्नत
चढ़ाते हैं।