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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

४ सहजो बाई
अभय दान दीनन कूँ दीन्हे । देखत आप सरीखे कीन्हे ॥
गुरु को किरपा अपरम्पारै । गुन गावत मम रसना हारै ॥
सेस सहस मुख निस दिन गावै । गुरु अस्तुति का अन्त न पावै ॥
मौन गहूँ अस्तुति कहा करूँ । बार बार चरनन सिर धरूँ ॥
चरनदास महिमा अधिकाई । सबेस वारे सहजो बाई ॥१४॥
गुरु मारग
॥ दोहा ॥
गुरु मग दृढ़ पग राखिये, डिगमिग डिगमिग छाँड ।
सहजो टेक टरै नहीं, सूर सती ज्यों माँड ॥१५॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के प्रेम पन्थ सिर दीजै । आगा पोछा कबहुँ न कीजै ॥
गुरु के पन्थ होय सो होई । मारग आन चलौ मत कोई ॥
गुरु के पन्थ पैज१ का पूरा । गुरु के पन्थ चलै सो सूरा ॥
गुरु के पन्थ चलै सो जोधा । गुरु के पन्थ चलै का बोदा ॥
गुरु के पन्थ नहीं ठग लागै । गुरु के पन्थ कपट भय भागै ॥
गुरु के पन्थ मुकित उजियारा । गुरु के पन्थ नहीं संसारा ॥
गुरु के पन्थ मिटै दुख दोई । गुरु के पन्थ महा सुख होई ॥
चरनदास कौ पन्थ दुहेला । गुरमुख चालै ताहि सुहेला ॥
गुरु के पन्थ चलै सतबादी । सहजो पावै भेद अनादी ॥१६॥
गुरु चरन
॥ दोहा ॥
अठसठ तीरथ गुरु चरन, परबी होत अखंड ।
सहजो ऐसा धाम नहिं, सकल अंड ब्रह्मांड ॥१७॥
सब तीरथ गुरु के चरन, नित ही परबी होय ।
सहजो चरनोदक लिये, पार रहत नहिं कोय ॥१८॥
(१) टेक ।