सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादस प्रकार के बचन साध के १५
दुर्जन ना साजन नहीं, नहीं बैर नहिं प्रोत ।
सकल बिकल उनके नहीं, सहजो हरि जन रोत ॥३१॥
सहजो हरि जन मुक्त हैं, डार दुई की पोट ।
चाह गई संसा मिटा, बंधन छूटे कोट ॥३२॥
राग द्वेष सूँ रहित हैं, बैरागी निरबन्ध ।
सहजो इच्छा ना रही, माथा ब्रह्म की संध ॥३३॥
आसन संजम साध करि, साधै प्रान अपान१ ।
सहजो मद्रा जौ सधै, तौ जोगो परवान ॥३४॥
तीनों बन्ध लगाय के, अनहद सुनै टकोर ।
सहजो सुन्न समाधि में, नहीं साँझ नहिं भोर ॥३५॥
ना सुख बिद्या के पढ़े, ना सुख बाद बिबाद ।
साध सुखी सहजो कहै, लागे सुन्न समाध ॥३६॥
मुए दुखी जोवत दुखी, दुखी भूख आहार ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ नित्त बिहार ॥३७॥
चाह दुखी आसा दुखी, महा दुखी अज्ञान ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ केवल ज्ञान ॥३८॥
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ॥३६॥
रंक दुखी राजा दुखी, दुखी सकल संसार ।
साध सुखी सहजो कहै, पाया भेद अपार ॥४०॥
ना सुख दारा सुत महल, ना सुख भूप भये ।
साध सुखी सहजो कहै, तृस्ना रोग गये ॥४१॥
द्वादस प्रकार के बचन साध के
१ मीठी बोली । ४ सीतल सुगन्ध बोली ७ बिघ्न-बिदार बोली १० भक्ति दृढ़ावन बोली
२ चरपरी बोली । ५ महाफूल बोली । ८ शुद्ध सुख सज्जन बोली ११ स्थिर बोली ।
३ अमृत-बचन बोली ६ सलिल बोली । ६ भर्म-निवारन बोली १२ साँची बोली ।
(१) प्राण और अपान वायुओं के नाम हैं—प्राण अंतर खिंचने वाली स्वासा को
और अपान बाहर चलने वाली स्वासा को कहते हैं, जिनको प्राणायाम के अभ्यास में
साधना पड़ता है ।
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