सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

साध महिमा ११
सहजो गुरु पूरा मिलै, सिष मैला घट चित्त ।
मेह बरसै कालर१ जिमीं, खेत न उपजै खित्त२ ॥६६॥
मलयागिरि के निकट जो, सब द्रुम चंदन होहिं ।
कीकर सीसों चीड़ बृछ, हुए न कबहूँ होहिं ॥६७॥
सिष माटी सिष पाथरा, सिष लकड़ी सम जोय ।
सहजो गुरु पारस लगे, कैसे कंचन होय ॥६८॥
सिष्य सराई३ तेल बिन, बाती भी नहिं माहिं ।
सहजो गुरु दीपक मिलै, चाँदन होसी नाहिं ॥६९॥
सहजो गुरु समरथ कला, सर्बदेसी सर्ब अंग ।
कोइ कैसा ही सिष्य हो, सब पर गेरै रंग ॥७०॥
सहजो गुरु रँगरेज सा, सबहीं कूँ रँग देत ।
जैसा तैसा बसन है, जो कोइ आवै सेत ॥७१॥
सहजो गुरु दरसन दियो, पूर रहे सब ठौर ।
जहाँ तहाँ गुरु ही लखै, दृष्टि न आवै और ॥७२॥
देखत ही आनंद भये, सतगुरु पहुँचे आय ।
भवसागर दुख रूप सूँ, सहजो लई बचाय ॥७३॥
चरनदास के चरन पर, सहजो वारै प्रान ।
जगत ब्याध सूँ काढ़ि कर, राख्यो पद निरबान ॥७४॥
सहजो गुरु महिमा कही, पढ़ सुनि हिया सिराय४ ।
उपजै गुरु की भक्ति दृढ़, दुबिधा दुर्मति जाय ॥७५॥
साध महिमा
॥ दोहा ॥
साध मिले गुरु पाइया, मिटि गये सब सन्देह ।
सहजो कूँ सम ही भयो, कहा गिरवर कहा गेह ॥ १ ॥
(१) कल्लर = ऊसर । (२) पृथ्वी । (३) दिया या दीवा । (४) ठंडा होय ।