सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ सहजो बाई
सहजो फिर पछितायगो, स्वास निकसि जब जाय ।
जब लग रहै सरीर में, राम सुमिर गुन गाय ॥२४॥
स्वास खजानो जातु है, ता की सोधो नाहिं ।
सहजो खर्चों का रह्यो, कर हिसाब घर माहिं ॥२५॥
सहजो नौबत स्वास की, बाजत है दिन रैन ।
मूरख सोवत है महा, चेतन कूँ नहिं चैन ॥२६॥
हिरनाकुस से ह्वै मिटे, दुर्जोधन सिसुपाल ।
कुंभकरन रावन गये, सहजो खाया काल ॥२७॥
निश्चै मरना सहजिया, जीवन की नहिं आस ।
क टूटी सी झोपड़ी, कै मन्दिर में बास ॥२८॥
कै गरीब सिर टोकरी, क सिर छत्तर होय ।
जन्म मरन में एक से, सहजो भाँति न दोय ॥२६॥
मरना है रहना नहीं, जाना वाही ठौर ।
सहजो कै कङ्गाल हो, कै हो द्रव्य कड़ोर ॥३०॥
आपन हूँ थिर होहिं जो, करै और को सोग ।
सहजो साथी नाव के, सभी बटाऊ लोग ॥३१॥
बैठि बैठि बहुतक गये, जग तरवर की छाँहिं ।
सहजो बटाऊ बाट के, मिलि मिलि बिछुड़त जाहिं ॥३२॥
यह रस्ता बहता रहै, थमै नहीं छिन एक ।
बहु आवैं बहु जातु हैं, सहजो आँखन देख ॥३३॥
जग देखत तुम जावगे, तुम देखत जग जाय ।
सहजो योंही रीति है, मत कर सोच उपाय ॥३४॥
मुए सो काया जारई, बहुरि न मिलिहै आय ।
रोये तें कहा होत है, सहजो झुरै बलाय ॥३५॥
झुरि झुरि के पिंजर भये, रोय गँवाये नैन ।
मरे गये सो ना मिले, सहजो सुने न बैन ॥३६॥