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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

८ सहजो बाई
उपदेश गुरुभक्ति का
॥ दोहा ॥
सिष का माना सतगुरु, गुरु झिड़कै लख बार ।
सहजो द्वार न छोड़िये, यही धारना धार ॥३१॥
गुरु दरसन कर सहजिया, गुरु का कीजै ध्यान ।
गुरु की सेवा कीजिये, तजिये कुल अभिमान ॥३२॥
सतगुरु दाता सर्व के, तू किर्पिन कंगाल ।
गुरु महिमा जानै नहीं, फस्यौ मोह के जाल ॥३३॥
गुरु सूं कछु न दुराइये, गुरु सूं झूठ न बोल ।
बुरी भली खोटी खरी, गुरु आगे सब खोल ॥३४॥
सहजो गुरु रच्छा करैं, मेटैं सब दुख दुन्द ।
मन को जानैं सब गुरु, कहा छिपावै अन्ध ॥३५॥
गुरु महिमा
॥ दोहा ॥
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ॥३६॥
परमेसर सूं गुरु बड़े, गावत बेद पुरान ।
सहजो हरि के मुक्ति है, गुरु के घर भगवान ॥३७॥
अष्टादस और चार षट, पढ़ि पढ़ि अर्थ कराहिं ।
भेद न पावैं गुरु बिना, सहजो सब भर्माहिं ॥३८॥
सकल बिकल सब छोड़ कर, गुरु चरनन चित लाव ।
सहजो निस्चै हरि जपो, बहुर न ऐसो दाव ॥३९॥
दीपक ले गुरु ज्ञान को, जगत अँधेरे माहिं ।
काम क्रोध मद मोह में, सहजो उरझै नाहिं ॥४०॥
सहजो गुरु परताप सूं, होय समुन्दर पार ।
बेद अर्थ गूँगा कहै, बानो कितइक बार ॥४१॥