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सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं गुरु-वन्दना

सहजो बाई की बानी
जीवन-चरित्र सहित
[ सहज प्रकाश ]
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहिब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
मुद्रक व प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स,
इलाहाबाद
सन् १९८० ई० [ मूल्य ४)

Centre for the Study of
Developing Societies
29, Rajpur Road,
DELHI - 110 054.

सहजो बाई
की
बानी
जीवन-चरित्र सहित
[ सहज प्रकाश ]
नये पदों के साथ जो अब मिले हैं छापी गई है।
यह अपूर्व पुस्तक बाबू अयोध्या प्रसाद साहिब, उर्फ लालाजी, रईस, आगरा,
की आज्ञानुसार छापी गई है।
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहिब बिना इजाजत के इस पुस्तक को नहीं छाप सकत ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स, इलाहाबाद ।
बारहवीं बार ] सन् १६७७ [ मूल्य २)
Printed at The Belvedere Printing Works, Allahabad, By Sheel Mohan

सहजो बाई का जीवन-चरित्र
सहजो बाई राजपूताना के एक प्रतिष्ठित धूसर कुल की स्त्री थीं जो परम भक्त हुईं और संत
मत के अनुसार साध गति को प्राप्त हुईं। इनका जीवन-चरित हमने भक्त-माल और उस प्रकार
की कई पुस्तकों में ढूँढ़ा परन्तु कहीं कुछ प्रमाणिक वृत्तान्त न पाया। उनकी बानी से इतना निश्चय
होता है कि वह सम्वत् १८०० में बर्तमान थीं और प्रसिद्ध महात्मा चरनदास जी की गुरुमुख चेली
थीं जो आप भी मेवात के एक धूसर कुल में प्रकट हुए थे और जिनके अनुयायी भारतवर्ष के देश-
देशान्तर में अब तक हजारों हैं, यद्यपि उनमें शब्द अभ्यासी और भेदी बिरले देख पड़ते हैं। सहजो
बाई की बानी से चरनदासजी के जन्म का समय भादों सुदी ३ मंगलवार संवत् १७६० बिक्रमी
प्रमान होता है।
सहजो बाई के विषय में कोई कोई चमत्कार के कौतुक प्रसिद्ध हैं परन्तु चूँकि उनका कहीं
प्रमान नहीं मिलता यहाँ लिखना उचित नहीं है। उनकी गहरी गुरुभक्ति और गति उनकी अति
कोमल, मधुर और हृदयवेधक बानी से जानी जा सकती है।
दयाबाई (जिनकी कोमल और मधुर बानी अलग छपी है) सहजो बाई की सजाती और
गुर-बहिन थीं।
अधम, एडिटर संतबानी पुस्तकमाला।
॥ सूचीपत्र ॥
सतगुरु महिमा का अंग १-३ | जन्म दशा २१-२४
हरि तें गुरु की विशेषता ३-४ | वृद्ध अवस्था २४-२६
गुरु मारग महिमा ४ | मृत्यु दशा २६-२७
गुरु चरन महिमा ४-५ | काल मृत्यु २७
गुरु आज्ञा ५-६ | अकाल मृत्यु २८-२६
गुरु-विमुख ६-७ | नाम का अंग २६-३२
गुरु शब्द ७ | नन्हा महा उत्तम का अंग ३२-३४
उपदेश गुरु भक्ति का ८ | प्रेम का अंग ३४-३५
गुरु महिमा ८-११ | अजपा गायत्री का अंग ३५
साधु महिमा ११-१३ | संत बैराग जगत मिथ्या का अंग ३५-३६
दुष्ट लक्षण १३ | सच्चिदानन्द का अंग ३६-३७
साधु लक्षण १३-१५ | नित्य अनित्य सांख्य मत का अंग ७-३८
द्वादस प्रकार के बचन साध के १५ | निर्गुन सर्गुन संशय निवारन भक्ति का अंग ३८-४१
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के १६ | सोलह तिथि निर्णय ४१-४५
बैराग उपजावन का अंग १६-२० | सात बार निर्णय ४५-४७
कर्म अनुसार योनि २०-२१ | मिश्रित पद ४८-६२

सहजो बाई का सहज प्रकाश
सतगुरु महिमा का अंग
॥ दोहा ॥
कर जोरूँ परनाम करि, धरूँ चरन पर सीस ।
दादा गुरु सुकदेव जी, पूरन बिस्वा बीस ॥ १ ॥
परमहंस तारन तरन, गुरु देवन गुरु देव ।
अनुभै बानो दीजिये, सहजो पावै भेव ॥ २ ॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो गुरु देवन देवा । नमो नमो गुरु अगम अभेवा ॥
नमो नमो निरलम्ब निरासा । नमो नमो परमातम बासा ॥
नमो नमो त्रिभुवन के स्वामी । नमो नमो गुरु अंतरजामी ॥
नमो नमो गुरु पातक हरता । नमो नमो परायन करता ॥
गति मति छाके आनँद रूपा । नमो नमो गुरु ब्रह्म सरूपा ॥
नमो नमो मम प्रान पियारे । नमो नमो तिर्गुन तें न्यारे ॥
भक्ती ज्ञान जोग के राजा । सहजो के पुरवो सब काजा ॥
जो कोइ सरन तुम्हारी आयौ । तुरियातीत बिज्ञान बसायौ ॥ ३ ॥
॥ दोहा ॥
निर्मल आनँद देत हौ, ब्रह्म रूप करि देत ।
जीव रूप की आपदा, ब्याधा सब हरि लेत ॥ ४ ॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो सुकदेव गुसाईं । प्रकट करी भक्ती जग माहीं ॥
श्रीमतभागवत् भानु प्रकासा । पढ़ सुनि कटै तिमिर को फाँसा ॥
ज्ञान जोग की नौका कीन्ही । चरनदास केवट को दीन्ही ॥
बहुतक पापी जीव चढ़ाये । भवसागर सूँ पार लँघाये ॥

' is round and connects to the letter.
In line 16: "ह्वै दीपक" -> here 'दीपक' has a FULL arc connecting to the 'द'!
Why would line 16 have "दोपक" in the first half and "दीपक" in the second half?
"बिना लोय १ दोपक सिष परसैं । ह्वै दीपक तिनहूँ कूँ दरसैं ॥"
Wait! Could it really be printed as 'दीपक' but with a broken type?
Yes, Belvedere Press is famous for worn-out lead types where the slender top curve of 'ी' breaks off, leaving what looks like 'ो' or a stump!
Wait, but if it's broken type, what is the word? The word is "दीपक" (lamp)!
Wait, could it be "दोपक"? In Braj, is "दीपक" ever written "दोपक"? No! "दीपक" is always "दीपक" or "दीवा" or "दीवरा". "दोपक" does not exist in Hindi/Braj!
Wait, what about "तीजो"? In Braj, "तीजो" IS a real word (तीसरा, तीजा, तीजो)!
What about "जल-लीक"? "लीक" is a real word.
Wait, let's look at "दीपक" in line 8:
If a human reads the page, they see "दीपक" (or maybe broken type). Should I transcribe "दीपक

हरि तें गुरु की विशेषता ३
चौथी तेल बूँद जल माहीं। फैलत फैलत फैलत जाही ॥
छोटी से दीरघ परकासै। बरन बरन के रंग निकासे ॥
तीन बुद्धि जग में दरसावै। चौथौ बुद्धि कोइ बिरले पावै ॥
सहजो बुधि सब थोथी कहिये। गुरु की कृपा सबन में चहिये॥१०॥
हरि तें गुरु की विशेषता
॥ दोहा ॥
हरि किरपा जो होय तो, नाहीं होय तो नाहिं।
पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि बहि जाहिं ॥११॥
॥ चोपाई ॥
राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ। गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ॥
हरि ने जन्म दियो जग माहीं। गुरु ने आवागवन छुटाहौं ॥
हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥
हरि ने कुटँब जाल में गेरी। गुरु ने काटी ममता बेरी१ ॥
हरि ने रोग भोग उरझायौ। गुरु जोगो कर सबै छुटायौ ॥
हरि ने कर्म भर्म भरमायौ। गुरु ने आतम रूप लखायौ ॥
हरि ने मो सूं आप छिपायौ। गुरु दीपक दै ताहि दिखायो ॥
फिर हरि बंधमुक्ति२ गति लाये। गुरु ने सबही भर्म मिटाये ॥
चरनदास पर तन मन वारू। गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ॥१२॥
॥ दोहा ॥
सब परबत स्याही करूँ, घोलूँ समुँदर जाय।
धरती का कागद करूँ, गुरु अस्तुति न समाय ॥१३॥
॥ चोपाई ॥
गुरु की अस्तुति कहँ लौं कीजै। बदला कहा गुरू कूँ दीजै ॥
गुरु का बदला दिया न जाई। मन में उपजत है सकुचाई ॥
इन नैनन जिन राम दिखाये। बंधन कोटि काटि मुक्ताये ॥
(१) बेड़ी। (२) ऐसी मुक्ति जिसमें झीनी माया का बन्धन लगा रहता है।

४ सहजो बाई
अभय दान दीनन कूँ दीन्हे । देखत आप सरीखे कीन्हे ॥
गुरु को किरपा अपरम्पारै । गुन गावत मम रसना हारै ॥
सेस सहस मुख निस दिन गावै । गुरु अस्तुति का अन्त न पावै ॥
मौन गहूँ अस्तुति कहा करूँ । बार बार चरनन सिर धरूँ ॥
चरनदास महिमा अधिकाई । सबेस वारे सहजो बाई ॥१४॥
गुरु मारग
॥ दोहा ॥
गुरु मग दृढ़ पग राखिये, डिगमिग डिगमिग छाँड ।
सहजो टेक टरै नहीं, सूर सती ज्यों माँड ॥१५॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के प्रेम पन्थ सिर दीजै । आगा पोछा कबहुँ न कीजै ॥
गुरु के पन्थ होय सो होई । मारग आन चलौ मत कोई ॥
गुरु के पन्थ पैज१ का पूरा । गुरु के पन्थ चलै सो सूरा ॥
गुरु के पन्थ चलै सो जोधा । गुरु के पन्थ चलै का बोदा ॥
गुरु के पन्थ नहीं ठग लागै । गुरु के पन्थ कपट भय भागै ॥
गुरु के पन्थ मुकित उजियारा । गुरु के पन्थ नहीं संसारा ॥
गुरु के पन्थ मिटै दुख दोई । गुरु के पन्थ महा सुख होई ॥
चरनदास कौ पन्थ दुहेला । गुरमुख चालै ताहि सुहेला ॥
गुरु के पन्थ चलै सतबादी । सहजो पावै भेद अनादी ॥१६॥
गुरु चरन
॥ दोहा ॥
अठसठ तीरथ गुरु चरन, परबी होत अखंड ।
सहजो ऐसा धाम नहिं, सकल अंड ब्रह्मांड ॥१७॥
सब तीरथ गुरु के चरन, नित ही परबी होय ।
सहजो चरनोदक लिये, पार रहत नहिं कोय ॥१८॥
(१) टेक ।

गुरु आज्ञा ५
॥ चौपाई ॥
सब तीरथ गुरु चरनन लारे। चरन बर्त दृढ़ सदा हमारे॥
चरन कँवल की निसदिन पूजा। परसूँ और देव नहिं दूजा॥
इष्ट हमारे गुरु के चरना। गुरु के चरन ध्यान हूँ करना॥
गुरु के चरन लगे सो तारे। गुरु के चरन प्रान सूँ प्यारे॥
आसा मनसा और करमना। गुरु के चरन प्रेम चित धरना॥
गुरु के चरन होय सो होना। हानि लाभ कै दुख सुख मरना॥
रनजीता¹ गुरु चरन तुम्हारे। जोवन प्रान अधार हमारे॥
गुरु के चरन मुक्ति फलदायक। सहजो गुरुके चरन सहायक ॥१९॥
॥ दोहा ॥
गुरु पग निश्चै परसिये, गुरु पग हिरदे राख।
सहजो गुरुपग ध्यान करि, गुरु बिन और न भाख ॥२०॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के चरन कँवल चित राखूँ। आठसिद्धि नौ निधि सब नाखूँ॥
सकल पदारथ गुरु पग माहीं। गुरु पग परसे सब दुख जाहीं॥
गति मति पलटे गुरु पग परसे। गुरु पग परसे त्रिभुवन दरसै॥
गुरु पग परसे ब्रह्म विचारै। गुरु पग परसे माया छाँड़ै॥
गुरु पग परसे जोग जुगन्ता। गुरु पग परसे जीवन मुक्ता॥
गुरु पग परसे बन्धन छूटै। मोह ममत की फाँसी टूटै॥
गुरु पग परसे हरि पद पावै। रहै अमर ह्वै गर्भ न आवै॥
चरनदास पग महिमा भारी। बार बार सहजो बलिहारी ॥२१॥
गुरु आज्ञा
॥ दोहा ॥
गुरु आज्ञा दृढ़ करि गहै, गुरु मत सहजो चाल।
रोम रोम गुरु को रटै, सो सिष होय निहाल ॥२२॥
(१) चरनदास जी का घरऊ नाम ।

६ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
गुरु की अज्ञा दृढ़ करि गहिये। गुरु की अज्ञा ही में रहिये ॥
गुरु अज्ञा बिन काज न कीजै। हानि होय तो होने दीजै ॥
गुरु की अज्ञा बिघ्न न कोई। गुरु की अज्ञा गुरुमुख होई ॥
गुरु की अज्ञा भक्ति बढ़ावै। गुरु की अज्ञा पार लँघावै ॥
गुरु की अज्ञा सकल सिरोमन। गुरु की अज्ञा चलै सो हरिजन ॥
गुरु अज्ञा मानै सोइ साधू। गुरु अज्ञा पद भेद अगाधू ॥
जो कोइ गुरु की अज्ञा भूलै। फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
चरनदास गुरु अज्ञा पूरी। बिन अज्ञा करनी सब कूरी ॥
अज्ञाकारी गुरुमुख नीके। सहजो लोक भोग सब फीके ॥२३॥
गुरु बिमुख
॥ दोहा ॥
गुरु अज्ञा मानै नहीं, गुरुहि लगावै दोष।
गुरु निन्दक जग में दुखो, मुए न पावै मोष ॥२४॥
॥ चौपाई ॥
ऐसों का दरसन नहिं लीजै। चर्चा बात गोष्टि नहिं कीजै ॥
उनका संग करै जो कोई। बेमुख निगुरा निन्दक होई ॥
गुरु-दोषी की गति मति गाऊँ। अपने मनहीं कूँ समझाऊँ ॥
उनकी चौरासी नहिं छूटै। काल जाल जम जोरा लूटै ॥
फिर फिर जूनो संकट आवै। गर्भ बास में बहु दुख पावै ॥
जग में पात बगूला जैसे। जीवत प्रेत निसाचर ऐसे ॥
मन मैला तन सदा उदासी। गल में डिम्भ कपट की फाँसी ॥
सहजो तिन तें दूरहि भाजै। नाम लेत मम रसना लाजै ॥२५॥
॥ दोहा ॥
जो कुछ करै तो मनमुखी, मेटै गुरुमुख रीत।
भेद बचन समझै नहीं, चलै चाल बिपरीत ॥२६॥

गुरु शब्द ७
साध कहावै आप कूँ, चलै दुष्ट की चाल ।
बाद लिये फूला फिरै, बहुत बजावै गाल ॥२७॥
॥ चौपाई ॥
बेमुख बिषई ज्ञान उचारै । पाँचो जीत न मन कूँ मारै ॥
दारा सुत कूँ हरि गुरु जाने । तन मन विषय बास लिपटाने ॥
पाप पुन्य कूँ झूठ बतावै । परनारी परधन चित लावै ॥
महा अजोगी जोग न ठानै । छल बल झूठ कपट सिध मानै ॥
साध संत कूँ ठगिया जानै । राम भक्ति कूँ तुच्छ बखानै ॥
ऐसे अपराधी मति मारे । तृस्ना काम क्रोध के जारे ॥
डूबे लोभ लहर के माहीं । सुपने छिमा सील चित नाहीं ॥
हिंसा अंकुस लिये दुखदाई । मुख देखै नहिं सहजो बाई ॥२८॥
गुरु शब्द
॥ दोहा ॥
गुरू बचन हियरे धरै, ज्यों किर्पिन के दाम ।
भुमि गड़े माथे दिये, सहजो लहै तो राम ॥२६॥
॥ चौपाई ॥
गुरु के सब्द हिये बिच धारै । गुरुमुख गुर के सब्द सम्हारै ॥
तीन लोक जम जोरा लूटै । गुरु के सब्द बिना नहिं छूटै ॥
मोह नींद में सब नर पागे । गुरु के सब्द बिना नहिं जागे ॥
गुरु के सब्द स्रवन जो जावै । छूटै कुबुधि परम गति पावै ॥
गुरु के सब्द प्रेम उजलावैं । गुरु के सब्द हरि आन मिलावै ॥
गुरु के सब्द जीव बुधि नासैं । गुरु के सब्द अभय पद भासैं ॥
गुरु के सब्द राह सोइ चलना । बेद पुरान कहा लै करना ॥
चरनदास गुरु सब्द तुम्हारे । हमरे भर्म फन्द सब जारे ॥
गुन सब गुरु के बचनै माहीं । सहजो सिष जो बिसरै नाहीं ॥३०॥

८ सहजो बाई
उपदेश गुरुभक्ति का
॥ दोहा ॥
सिष का माना सतगुरु, गुरु झिड़कै लख बार ।
सहजो द्वार न छोड़िये, यही धारना धार ॥३१॥
गुरु दरसन कर सहजिया, गुरु का कीजै ध्यान ।
गुरु की सेवा कीजिये, तजिये कुल अभिमान ॥३२॥
सतगुरु दाता सर्व के, तू किर्पिन कंगाल ।
गुरु महिमा जानै नहीं, फस्यौ मोह के जाल ॥३३॥
गुरु सूं कछु न दुराइये, गुरु सूं झूठ न बोल ।
बुरी भली खोटी खरी, गुरु आगे सब खोल ॥३४॥
सहजो गुरु रच्छा करैं, मेटैं सब दुख दुन्द ।
मन को जानैं सब गुरु, कहा छिपावै अन्ध ॥३५॥
गुरु महिमा
॥ दोहा ॥
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ॥३६॥
परमेसर सूं गुरु बड़े, गावत बेद पुरान ।
सहजो हरि के मुक्ति है, गुरु के घर भगवान ॥३७॥
अष्टादस और चार षट, पढ़ि पढ़ि अर्थ कराहिं ।
भेद न पावैं गुरु बिना, सहजो सब भर्माहिं ॥३८॥
सकल बिकल सब छोड़ कर, गुरु चरनन चित लाव ।
सहजो निस्चै हरि जपो, बहुर न ऐसो दाव ॥३९॥
दीपक ले गुरु ज्ञान को, जगत अँधेरे माहिं ।
काम क्रोध मद मोह में, सहजो उरझै नाहिं ॥४०॥
सहजो गुरु परताप सूं, होय समुन्दर पार ।
बेद अर्थ गूँगा कहै, बानो कितइक बार ॥४१॥