सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ सहजो बाई
त्यागै झूठ साँच मुख बोलै । चित इस्थिर इत उत ना डोलै ॥
तन जग में मन हरि के पासा । लोक भोग सूँ सदा उदासा ॥
जत सत नख सिख सीतलताई । तन मन बचन सकल सुखदाई ॥
निर्गुन ध्यानी ब्रह्म गियानी । मुख सूँ बोलै अमृत बानी ॥
समझ एकता भाव न दूजे । जिनके चरन सहजिया पूजे ॥२१॥
॥ दोहा ॥
निर्द्वन्दी निर्बैरता, सहजो अरु निर्बास ।
सन्तोषी निर्मल दसा, तकै न पर को आस ॥२२॥
ज्ञान मध्य इस्थिर दसा, ध्यान मध्य गलतान ।
सहजो साधू राम के, तजैं बड़ाई मान ॥२३॥
जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरि नाम ।
जो बोलैं तो हरि कथा, भक्ति करैं निःकाम ॥२४॥
तन मन मेटैं खेद सब, तज उपाधि की चाल ।
सहजो साधू राम के, तज कनक और बाल१ ॥२५॥
दीर्घ बुद्धि जिनकी महा, सील सदा ही नैन ।
चेतनता हिरदे बसै, सहजो सीतल बैन ॥२६॥
तन कूँ साधे हो रहैं, चित कूँ राखैं हाथ ।
सहजो मन कूँ यौँ गहैं, चलै न इन्द्रिन साथ ॥२७॥
नित ही प्रेम पगे रहैं, छके रहैं निज रूप ।
समदृष्टी सहजो कहै, समझैं रंक न भूप ॥२८॥
सुरत नहीं ब्यौहार में, जगत रीत सूँ पीठ ।
सनमुख हैं गुरु भक्ति में, सहजो हरि के ईठ२ ॥२६॥
साध असंगी सँग तजैं, आतम ही को संग ।
बोध रूप आनन्द में, पियैं सहज को रंग ॥३०॥
(१) स्त्री । (२) इष्ट, प्यारे ।