सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
पापी जीव गर्भ जब आवै । भवन अँधेरे बहु दुख पावै ॥
तल मूड़ी ऊपर को पाऊँ । मुख लिगी१ और बिष्टा ठाऊँ ॥
जठर अगिन इक रस जहँ लागी । अधिक तपै जहँ पतित अभागी ॥
खट्टा मीठा माता खावै । लागि छुरी सी बहु दुख पावै ॥
आप दुखो माता दुख पाया । दसें महीने जग में आया ॥
जग जंजाल देखकर रोया । नर नारी मिलि सभी बिगोया ॥
माया मोह पवन लगि भूला । सहजो गोद पालने झूला ॥
नाते सभी लगे उठि झूठे । पड़ा बन्ध में कैसे छूटे ॥६८॥
॥ दोहा ॥
सब नाते उठि उठि लगे, रोम रोम लिया बन्ध ।
सहजो यह भी रलि मिला, फिर फिर भूला अन्ध ॥६६॥
॥ चौपाई ॥
कोई कहै मैं इसकी माई । कोई कहै लाला की दाई ॥
कोई कहै यह सुन्दर हीरा । गोद खेलाऊँ अपना बीरा ॥
कोई कहै में या का बापू । बालक पाया पुत्र प्रतापू ॥
कोई कहै मैं या की बूवा । चाचा कहै भतीजा हूवा ॥
कोई कहै यह मेरा भाई । कोई कहै मैं दादी आई ॥
कोई कहै मैं मा की बहिनी । कोई कहै मैं या की नानी ॥
कोई कहै मैं इसका मामा । लाया खाँड़ खड़ूले जामा ॥
कोई कहै मैं या का नाना । मामी ने भांजा करि जाना ॥
कोई कहै यह पोता बाल२ । कोई कहै यह मेरा लाल३ ॥७०॥
॥ दोहा ॥
सब नाते लिये मान कर, घेरा घेरी घेर ।
झूठे साँचे से लगैं, सुपने कंचन मेर४ ॥७१॥
(१) मूत्र या पेशाब । (२) बाला । (३) साला । (४) पहाड़ ।