सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
गुरु की अज्ञा दृढ़ करि गहिये। गुरु की अज्ञा ही में रहिये ॥
गुरु अज्ञा बिन काज न कीजै। हानि होय तो होने दीजै ॥
गुरु की अज्ञा बिघ्न न कोई। गुरु की अज्ञा गुरुमुख होई ॥
गुरु की अज्ञा भक्ति बढ़ावै। गुरु की अज्ञा पार लँघावै ॥
गुरु की अज्ञा सकल सिरोमन। गुरु की अज्ञा चलै सो हरिजन ॥
गुरु अज्ञा मानै सोइ साधू। गुरु अज्ञा पद भेद अगाधू ॥
जो कोइ गुरु की अज्ञा भूलै। फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
चरनदास गुरु अज्ञा पूरी। बिन अज्ञा करनी सब कूरी ॥
अज्ञाकारी गुरुमुख नीके। सहजो लोक भोग सब फीके ॥२३॥
गुरु बिमुख
॥ दोहा ॥
गुरु अज्ञा मानै नहीं, गुरुहि लगावै दोष।
गुरु निन्दक जग में दुखो, मुए न पावै मोष ॥२४॥
॥ चौपाई ॥
ऐसों का दरसन नहिं लीजै। चर्चा बात गोष्टि नहिं कीजै ॥
उनका संग करै जो कोई। बेमुख निगुरा निन्दक होई ॥
गुरु-दोषी की गति मति गाऊँ। अपने मनहीं कूँ समझाऊँ ॥
उनकी चौरासी नहिं छूटै। काल जाल जम जोरा लूटै ॥
फिर फिर जूनो संकट आवै। गर्भ बास में बहु दुख पावै ॥
जग में पात बगूला जैसे। जीवत प्रेत निसाचर ऐसे ॥
मन मैला तन सदा उदासी। गल में डिम्भ कपट की फाँसी ॥
सहजो तिन तें दूरहि भाजै। नाम लेत मम रसना लाजै ॥२५॥
॥ दोहा ॥
जो कुछ करै तो मनमुखी, मेटै गुरुमुख रीत।
भेद बचन समझै नहीं, चलै चाल बिपरीत ॥२६॥