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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

गुरु महिमा ६
सहजो सतगुरु के मिले, भये और सूँ और ।
काग पलट गति हंस ह्वै, पाई भूली ठौर ॥४२॥
सहजो यह मन सिलगता, काम कोध की आग ।
भली भई गुरु ने दिया, सील छिमा का बाग ॥४३॥
निस्चै यह मन डूबता, मोह लोभ की धार ।
चरनदास सतगुरु मिले, सहजो लई उबार ॥४४॥
ज्ञान दीप सतगुरु दियौ, राख्यो काया कोट ।
साजन बसि दुर्जन भजे१, निकस गई सब खोट ॥४५॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार ।
तीन लोक दृष्टा भये, मिट्यौ भरम अँधियार ॥४६॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, नैना भये अनन्त ।
आदि अन्त मध एक ही, सूझि पड़े भगवन्त ॥४७॥
सहजो गुरु दीपक दियौ, देख्यौ आतम रूप ।
तिमिर गयौ चाँदन भयौ, पायौ परघट भूप ॥४८॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मेट्यौ मन सन्देह ।
रोम रोम सूँ प्रेम उठि, भींज गई सब देह ॥४६॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, एक कह्यौ परसंग ।
तन मन तें पलटी गई, रंगी प्रेम के रंग ॥५०॥
सहजो गुरु परसन्न ह्वै, मूँद लिये दोउ नैन ।
फिर मो सूँ ऐसे कही, समझ लेहि यह सैन ॥५१॥
सहजो गुरु किरपा करी, कहा कहूँ मैं खोल ।
रोम रोम फुल्लित भई, मुखे न आवै बोल ॥५२॥
चिंउटी जहाँ न चढ़ि सकै, सरसों ना ठहराय ।
सहजो कूँ वा देस में, सतगुरु दई बसाय ॥५३॥
(१) भागे ।