सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

जन्म दशा २१
जहाँ बासना जित ही जाई । यह मत बेद पुरानन गाई ॥
चरनदास गुरु मोहिं बताई । तजो बासना सहजोबाई ॥
॥ दोहा ॥
सहजो लोक प्रलोक की, नहीं बासना ताहि ।
सो वह ब्रह्म सरूप है, सागर लहर समाय ॥५७॥
जा की गुरु में बासना, सो पावै भगवान ।
सहजो चौथे पद बसै, गावत बेद पुरान ॥५८॥
परमेसुर की बासना, अन्त समय मन माहिं ।
तन छूटै हरि कूँ मिलै, उपजै बिनसै नाहिं ॥५६॥
साध संग की बासना, जेहि घट पूरी सोय ।
मनुष जन्म सतसंग मिलै, भक्ति परापत होय ॥६०॥
सहजो हरि के नाम की, रहै बासना बीर ।
चौरासी संकट कटै, जम की छूटै पीर ॥६१॥
चौरासी काया पहिर, दुख सहे नाना त्रास ।
भली भई अब के कुसल, चरनदास की आस ॥६२॥
चौरासी के त्रास सुनि, जम किंकर की मार ।
सहजो आई गुरु सरन, सुमिरचो सिरजनहार ॥६३॥
धन जोबन सुख सम्पदा, बाहर की सी छाहँ ।
सहजो आखिर धूप है, चौरासी के माहँ ॥६४॥
चौरासी जोनी भुगत, पायौ मनुष सरीर ।
सहजो चूके भक्ति बिनु, फिर चौरासी पीर ॥६५॥
जन्म दशा
॥ दोहा ॥
जन्म मरन अब कहत हूँ, कहूँ अवस्था चार ।
चौरासी जमदंड कूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥६६॥
चरनदास आज्ञा दई, सहजो परगट गाय ।
ता सूँ पढ़ि सुनि जीव की, सकल बन्ध कटि जाय ॥६७॥