सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सहजो बाई
सिष पौधा नौधा अभी, गुरु किरपा की बाड़ ।
सहजो तरवर फैल बड़, सुफल फलै वह झाड़ ॥५४॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे माटी मोय ।
आपा सौंपि कुम्हार कूँ, जो कछु होय सो होय ॥५५॥
सहजो सिष ऐसा भला, जैसे चकई डोर ।
गुरु फेरै त्यौं ही फिरै, त्यागै अपना खोर१ ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे धोबी होय ।
दै दै साबुन ज्ञान का, मलमल डारै धोय ॥५७॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, मेटै मन सन्देह ।
नीच ऊँच देखै नहीं, सब पर बरसै मेह ॥५८॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, जैसे सूरज धूप ।
सब जीवन कूँ चाँदना, कहा रंक कहा भूप ॥५६॥
सहजो गुरु ऐसा मिलै, समदृष्टी निर्लोभ ।
सिष कूँ प्रेम समुद्र में, करदे झोबाझोब ॥६०॥
सहजो गुरु बहुतक फिरैं, ज्ञान ध्यान सुधि नाहिं ।
तार सकैं नहिं एक कूँ, गहैं बहुत की बाहिं ॥६१॥
ऐसे गुरु तो बहुत हैं, धूत धूत धन लेहिं ।
सहजो सतगुरु जो मिलैं, मुक्ति धाम फल देहिं ॥६२॥
कुटंब जाल जित तित रुप्यो, पसु पंछी नर माहिं ।
सहजो गुरुबर्ती बचै, निगुरे अरुझत जाहिं ॥६३॥
बार बार नाते मिलैं, लख चौरासी माहिं ।
सहजो सतगुरु ना मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ॥६४॥
जन्म जन्म हरि संग ही, मिलि रह्यो आठो जाम ।
सहजो गुरु के बिन मिले, पायौ ना बिसराम ॥६५॥
(१) रास्ता, आदत ।