सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सहजो बाई
बहुत गई थोड़ी रही, यह भां रहसी नाहिं ।
जन्म जाय हरि भक्ति बिनु, सहजो झुर मन माहिं ॥४६॥
कर्म अनुसार योनि
॥ दोहा ॥
उपजि उपजि फिर फिर मरौ, जम दे दारुन दुक्ख ।
लाज नहीं सहजो कहै, धिर्ग तुम्हारो मुक्ख ॥५०॥
पसु पंछी नर सुर असुर, जलचर१ कीट पतंग ।
सबही उतपति कर्म की, सहजो नाना अंग ॥५१॥
कर्मन के प्रेरे फिरौ, जन्म जन्म दुख होय ।
मुक्ति बिचारो सहजिया, आवागवन जु खोय ॥५२॥
जन्म चलो ही जातु है, ये दिन आछे जाहिं ।
जीवत जागह ना करी, बैठोगे केहि ठांहि ॥५३॥
सहजो रहै मन बासना, तैसी पावै ठौर ।
जहाँ आस तहँ बास है, निस्चै करी कठोर ॥५४॥
देह छूटै मन में रहे, सहजो जैसी आस ।
देह जन्म जैसो मिलैँ, जैसे ही घर बास ॥५५॥
॥ चौपाई ॥
जा को आस रहै मन्दिर में। होकर घूँस बसै सो घर में ॥
रहै बासना द्रव्य मँझारा । जन्मै नाग होय पुनि कारा ॥
रहै बासना तिरिया माहीं। कोटी२ स्वान धरै तन आई ॥
रहै बासना पुर्षा बर की । कुतिया होय चूहड़े३ घर की ॥
जा की रहै पुत्र में आसा । सूवर जन्म नीच घर बासा ॥
जा का मन रहै राज दुवारे । हस्ती हो सिर मेलै छारे ॥
रहै बासना नीर पियासी । मीन देह धरि जल की बासी ॥
रहै बासना बाहन संगा । होय जन्म ले बाहन४ अंगा ॥
(१) थिरचर । (२) योनि । (