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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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बैराग उपावन का अङ्ग १७


कोई किसी के संग ना, रोग मरन दुख बन्ध ।
इतने पर अपनौ कहैं, सहजो ये नर अन्ध ॥११॥
दरद बटाय सकैं नहीं, मुए न चालैं साथ ।
सहजो क्योंकर आपने, सब नाते बरबाद ॥१२॥
मर बिछुड़ै जो कुटँब सूँ, बहुर न देखै आय ।
महल द्रव्य सन्तान कू, सहजो पचै बलाय ॥१३॥
मरि बिछुड़न यों होइगो, ज्यों तरवर सूँ पात ।
सहजो काया प्रान यों, मुख सेती ज्यों बात ॥१४॥
सहजो जीवत सब सगे, मुए निकट नहिं जायँ ।
रोवैं स्वारथ आपने, सुपने देख डरायँ ॥१५॥
सहजो धन माँगे कुटँब, गाड़ा धरा बताय ।
जो कछु है सो दे हमें, फिर पाछे मरि जाय ॥१६॥
मुख देखै ढाँपै भजै, तड़ दे तोड़े नेह ।
सहजो पति सुत निज हितू, जारि करेंगे खेह ॥१७॥
काढ़ काढ़ बेगी कहैं, भीतर बाहर लोय ।
जीव छुटे सहजो कहै, तन का सगा न कोय ॥१८॥
यह मन्दिर यह नारि है, यह धन यह सन्तान ।
तेरो ना सहजो कहै, काहे करत गुमान ॥१९॥
जन्म जुवा सों हारिहो, कियो न लाहा सूल ।
डार पात फल सींच कर, सहजो काटत मूल ॥२०॥
सहजो गुरु परताप सूँ, ऐसी जान पड़ी ।
नहीं भरोसा स्वास का, आगे मौत खड़ी ॥२१॥
भीतर का भीतर खुलै, कै बाहर खुलि जाय ।
देह खेह है जायगी, जैहौ जन्म गँवाय ॥२२॥
स्वासा दीपक के बुझे, होत अँधेरी देह ।
सहजो सूनी प्रान बिनु, जब कैसो हरि नेह ॥२३॥