सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
४२ सहजो बाई
कैसे पावै चैन बिना साधू की संगत ।
दुनिया रंग पतंग मजीठी गुरु की रंगत ॥
जन्म मरन ता सूँ छुटै सहजो दरसै राम ।
चौरासी के दुख मिटै पावै निज पुर धाम ॥
॥ तीज ॥
तीज तनिक सुख कारने बहुत फसायो जीव ।
लालच लगि ऐसो गिरै जैसे मक्खी घीव ॥
जैसे मक्खी घीव डूब करि निकसै नाहीं ।
ऐसे यह नर बूड़ि रहै कुनबे के माहीं ॥
मनुखा देही पाय कै सहजो डारी खोय ।
जमपुर बाँधे वे चले चौरासी दुख होय ॥
॥ चौथ ॥
चौथ चहूँ दिस तिमिर है महा घोर भयमान ।
मूरख जन सोवत तहाँ मिथ्या ते अज्ञान ॥
मिथ्या ते अज्ञान सत्य कूँ जानत नाहीं ।
बन बन ढूँढ़त फिरत राम अपने ही माहीं ॥
ज्यों मिंहदी में रंग है लकड़ी मध्य हु तास ।
सहजो काया खोजि ले काहे रहत उदास ॥
॥ पाँचै ॥
पाँचौ इन्द्री बस करौ मन जीतन की ठान ।
पवन रोक अनहद लगौ पावौ पद निर्बान ॥
पावौ पद निर्बान करौ तुम ऐसी करनी ।
आसन संजम साध बन्ध लागै जब धरनी ॥
चित मन बुधि हंकार कूँ करौ इकट्ठे आन ।
सहजो निज मन होय जब निश्चल लागै ध्यान ॥
॥ छठ् ॥
छहूँ कँवल कूँ देख करि सतवें में घर छाव ।
रसना उलटि लगाव करि जब आगे कूँ धाव ॥
सोलह तिथि निर्णय ४३
जब आगे कूँ धाव देख करि जगमग जोती ।
बिन दामिनि चमकार सीप बिन उपजै मोती ॥
हंस हिंस जहँ होत है ओअं ओअं¹ होय ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो सुरति समोय ॥
॥ सातें ॥
सतसंगति ही कीजिये सत ही कथिये ज्ञान ।
सत ही मुख सूँ बोलिये सत ही कीजै ध्यान ॥
सत ही कीजै ध्यान हद तजि बेहद लागौ ।
तीन अवस्था छोड़ि जाय तुरिया सूँ पागौ ॥
निराकार निर्गुन तहाँ एकरस चेतन रूप ।
रात दिना सहजो नहीं नहीं छाँह नहि धूप ॥
॥ आठें ॥
आठन कूँ जाने नहीं दस कूँ नाहीं भेद ।
चौबीसो समझै नहीं कैसे छूटै खेद ॥
कैसे छूटै खेद पंच कूँ जीतै नाहीं ।
और पचीसौ संग रहै उनके² ही माहीं ॥
दोय सदा लागो रहै चौरासी के फेर ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो आपा हेर ॥
॥ नौमी ॥
निन्दा हिंसा त्याग करि तामस कूँ दे पीठ ।
चित कूँ अस्थिर कीजिये नासा आगे दीठ ॥
नासा आगे दीठ जहाँ कछु देखौ भाई ।
पाँच तत्त दरसायँ और अचरज दरसाई ॥
तिरदेवा और आठ सिधि देखौ इन्दूर³ भूप ।
चरनदास कहैं सहजिया साधन अधिक अनूप ॥
(१) ओंओं जहँ । (२) उन्हीं के । (३) चांद ।
४४ सहजो बाई
॥ दसमी ॥
दसो दिसा भर पूर है ता में ये सब पिंड ।
ज्यों सरवर में बुदबुदे ब्रह्म बीच ब्रह्मांड ॥
ब्रह्म बीच ब्रह्मांड तासु को वार न पारा ।
ऐसो तत्त अगाध नेत कहि निगम पुकारा ॥
चरनदास कहें सहजिया गुरु से लेवौ ज्ञान ।
नैना होहिं अनन्त ही जब यह पावै जान ॥
॥ एकादसी ॥
ग्यारह गति जो चहत हौ तजौ जगत की आस ।
कलह कल्पना छाँड़ि के आतम में करि बास ॥
आतम में करि बास खैंच इन्द्री दस लावौ ।
मन इस्थिर जब होय सुरति और निरति मिलावौ ॥
ध्याता थाके ध्यान में ध्यान ध्येय के माहिं ।
जनम मरन मिटि सहजिया उपजै बिनसै नाहिं ॥
॥ द्वादसी ॥
द्वादस दावा दूर करि दावे ही में दुख ।
राग दोष और आपदा अकस निवारे सुख ॥
अकस निवारे सुख मोहिं चरनदास दुहाई ।
तामस सब हो त्याग तासु में बहुत भलाई ॥
काम क्रोध मद लोभ कूँ ज्ञान अगिन सूँ जार ।
जब निर्मल ह्वै सहजियो आनँद लहै अपार ॥
॥ तेरस ॥
तेरस तन अचरज महा छिनभंगी छल रूप ।
देखत ही देखत गये कहा रंक कहा भूप ॥
कहा रंक कहा भूप कोई रहने नहिं पावै ।
इत सूँ सबही जाहि बहुरि उत सूँ नहिं आवै ॥
इतने ऊपर घर करै महल दरब सन्तान ।
हाँसो आवै सहजिया ये मूरख मस्तान ॥
सात वार निर्णय ४५
॥ चौदस ॥
चौरासी भुगती घनी बहुत सही जम मार ।
भरम फिरे तिहुँ लोक में तहू न मानी हार ॥
तहू न मानी हार मुक्ति की चाह न कीन्ही ।
हीरो देही पाय मोल माटी के दीन्ही ॥
मूरख नर समझै नहीं समझाया बहु बार ।
चरनदास कहैं सहजिया सुमिरै ना करतार ॥
॥ पूनो ॥
पूनो पूरा गुरु मिलै मेटै सब सन्देह ।
सोवत सूँ चेतन्न होय देखै जाग्रत गेह ॥
देखै जाग्रत गेह जहाँ सूँ सपने आयौ ।
जग कूँ जान्यौ साँच रूप अपनो बिसरायौ ॥
चरनदास कहैं सहजिया गुरु चरनन चित लाव ।
तिमिर मिटै अज्ञान कूँ ज्ञान चाँदनो पाव ॥
॥ दोहा ॥
सोलह तिथि पूरन भई, सहजो करो बखान ।
चरनदास की दया सूँ, मिटौ सकल अज्ञान ॥
लिखै पढ़ै सुनै प्रीत सूँ, ता को पाप नसाहि ।
और ऐसी करनी करै, मुक्ति रूप ह्वै जाहि ॥
॥ सात वार निर्णय ।'
॥ दोहा ॥
नमो नमो सुकदेव जी, तुम्हरी सरन गही ।
मेरे सिर पर हाथ धरि, चरनों लागि रही ॥
सात वार बरनन करूँ, कुँडली माहिं उचार ।
याही सुख सूँ कहत हूँ, तुम कूँ हिरदे धारि ॥
॥ कुण्डलिया ॥
( १ )
मंगल मालो राम है, जाका यह जग बाग ।
निस दिन ताही में रहै, वा ही सेती लाग ॥
४६ सहजो बाई
वा ही सेती लाग, करी जिन यह गुलजारी।
पात पात की खबर, डाल सब लागै प्यारी॥
आपन हो कूँ जानि लै, वाही ठौर का फूल।
चरनदास कहै सहजिया, ऐसे समझो कूल॥
(२)
बुध बारी में फल घने, जो पै देवै बाड़।
रखवारी के बिन किये, पाँचौ करै उजाड़॥
पाँचौ करै उजाड़, पचीसौ चरि चरि जाई।
सावधान जो होय, सोई वा के फल खाई॥
चरनदास कहै सहजिया, ऐसे समुझ बिचार।
तेरी काया में खिले, भाँति भाँति गुलजार॥
(३)
बृहस्पति वारी आइया, पाई मनुषा देह।
सो तन छिन छिन घटत है, भयौ जात है खेह॥
भयौ जात है खेह, बहुरि लाहा कब लैहौ।
बेगहिं समुझ सँभार, नहीं बहुतै पछितैहौ॥
आगा पीछा क्या करै, सकल बासना त्याग।
चरनदास कहै सहजिया, हरि सुमिरन कूँ लाग॥
(४)
सुक्कर सर१ उपदेस का, लगा कलेजे नाहिं।
ते नर पसू समान हैं, या दुनियाँ के माहिं॥
या दुनियाँ के माहिं, सदा चक्कर में डोलैं।
आवा गौन दुख महा, तासु की गाँठि न खोलैं॥
ऐसे मूरख बावरे, भोंदू मुग्ध२ गँवार॥
चरनदास कहै सहजिया, भरमैं बारम्बार॥
(१) बान, तीर। (२) मूर्ख।
सात वार निर्णय ४७
( ५ )
थावर१ थिर करतार है, और सकल मिटि जाय ।
जा तें सूमति प्रीति करि, रहते चित्त लगाय ॥
रहते चित्त लगाय, तासु ने जग उपजाया ।
वा की सरनै आय, करै बहु बिधि को काया ॥
ऐसा हरि का नाम है, जनम मरन मिटि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, साचे सूँ लौ लाय ॥
( ६ )
एत जो आये जगत में, हरि सुमिरन के काज ।
ह्याँ कुछ कीया और ही, नेक न आई लाज ॥
नेक न आई लाज, साज सब खोटे कीन्हे ।
सदा रहे अज्ञान, राम घट में नहिं चीन्हे ॥
जैहौ जनम गँवाय के, पछितावा रहि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, कहा कियौ तन पाय ॥
( ७ )
सोम सिरीपति३ सेइये, गुरु की आयस४ लेय ।
सतसंगति अचरज कथा, ताही में मन देय ॥
ताही में मन देय, और ऊँचा नहिं या तें ।
और सकल धर्म उरै५, सभी थोथो है बातैं ॥
चरनदास कहै सहजिया, भक्ति सिरोमनि जान ।
तन धन चित बुध प्रान कूँ, ता में दीजै आन ॥
॥ दोहा ॥
सात वार ये मैं कहे, जा में हरि का भेद ।
जो कोइ समुझै प्रीति सूँ, छूटै सबही खेद ॥
सातो वारों बीच में, जग उपजै मिटि जाय ।
सहजो बाई हरि जपौ, आवागवन नसाय ॥
(१) अडोल । (२) इत, यहाँ । (३) श्रीपति = विष्णु । (४) आज्ञा । (५) वरे, पीछे ।
७
४८ सहजो बाई
मिश्रित पद
॥ राग गौरी ॥
नमो नमो गुरु तुम सरना ।
तुम्हरे ध्यान भरम भय भागैं, जीते पाँचौ मरना१ ॥१॥
दुख दारिद्र मिटै तुम नाऊँ, कर्म कटैं जो होहिं घना ।
लोक परलोक सकल बिधि सुधरै, पग लागैं आय ज्ञान गुना ॥२॥
चरन छुए सब गति मति पलटै, पारस जैसे लोह सुना२ ।
सीप परसि स्वाँती भयो मोती, सोहत है सिर राज रना ॥३॥
ब्रह्म होय जीव बुधि नासै, जब कैसो होना मरना ।
अमर होय अमरापद पावै, यह गुर कहिये गुरु बचना ॥४॥
चरनदास गुरु पूरे पाये, जग का दुख सुख क्यों सहना ।
सहजो बाई ब्याध छुटा कर, आनँद मंगल में रहना ॥५॥
॥ राग सोरठा ॥
( १ )
हमारे गुरु बचनन की टेक ।
आन धरम कूँ नाहिं जानूँ, जपूँ हरि हरि एक ॥ १ ॥
गुरु बिना नहिं पार उतरौ, करौ नाना भेख ।
रमौ तीरत बर्त राखौ, होहु पंडित सेख ॥ २ ॥
गुरु बिना नहिं ज्ञान दीपक, जाय ना अँधियार ।
काम क्रोध मद लोभ माहीं, उरझिया संसार ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दया करि कै, दिये मन्तर कान ।
सहजो घट परगास हूवा, गयौ सब अज्ञान ॥ ४ ॥
( २ )
भया हरि रस पी मतवारा ।
आठ पहर झूमत ही बीतै, डार दिया सब भारा ॥ १ ॥
(१) सोना ।
मिश्रित पद ४६
इड़ा पिंगला ऊपर पहुँचे, सुखमन पाट उघारा।
पीवन लगे सुधारस जब ही, दुर्जन पड़ी बिडारा॥ २॥
गंग जमन बिच आसन मार्यौ, चमक चमक चमकारा।
भँवर गुफा में दृढ़ ह्वै बैठे, देख्यो अधिक उजारा॥ ३॥
चित इस्थिर चंचल मन थाका, पाँचौ का बल हारा।
चरनदास किरपा सूँ सहजो, भरम करम भए छारा॥ ४॥
। राग मलार ॥
( १ )
हमारे गुरु पूरन दातार।
अभय दान दीनन को दीन्हे, कीन्हें भवजल पार॥ १॥
जन्म जन्म के बन्धन काटे, जम की बंध निवार।
रंक हुते सो राजा कीन्हे, हरि धन दियौ अपार॥ २॥
देवैं ज्ञान भक्ति पुनि देवैं, जोग बतावनहार।
तन मन बचन सकल सुखदाई, हिरदे बुधि उँजियार॥ ३॥
सब दुख-गंजन पातक-भंजन, रंजन ध्यान बिचार।
साजन दुर्जन जो चलि आवै, एकहि दृष्टि निहार॥ ४॥
आनँद रूप सरूप मई है, लिप्त नहीं संसार।
चरनदास गुरु सहजो के रे, नमो नमो बारम्बार॥ ५॥
( २ )
अस जन धन जननी जिन जाये।
दूसर कुल में भक्ति नहीं थी, जा कूँ तारन आये॥ १॥
कारन परमारथ तन धार्यौ, बहुतक जीव उबारे।
खेवट ह्वै भवसागर माहौँ, सरन लगे सो तारे॥ २॥
मुक्ति सरूप भूप मन जोते, आसा सकल जराये।
भक्ति खेत में लोभ खरतुवा१, ता कूँ रहन न पाये२॥ ३॥
(१) मोथा घास जिसकी जड़ बड़ी लम्बी होती है। (२) लाये।
५० सहजो बाई
ज्ञान जोग को सूरज प्रगट्यौ, बानी किरन पसारी ।
चार दिसा में भयौ उजारो, चौंक उठे नर नारी ॥ ४ ॥
प्रेम भलाभल नैनन माहीं, हिरदे सीतलताई ।
नख सिख सील सँतोष छिमा हीं, बरनै सहजो बाई ॥ ५ ॥
( ३ )
सखीरी आज धन धरती धन देसा ।
धन डहरा मेवात मँझारे, हरि आये जन भेसा ॥ १ ॥
धन भादों धन तीज सुदी है, धन दिन मंगलकारी ।
धन दूसर कुल बालक जनम्यौ, फुल्लित भये नर नारी ॥ २ ॥
धन धन माई कुञ्जो रानी, धन मुरलीधर ताता ।
अगले दत्तव१ अब फल पाये, तिन कै सुत भयौ ज्ञाता ॥ ३ ॥
भरम नसावन भक्ति बढ़ावन, बहु पारायन२ करता ।
सब फल दायक सब कुछ लायक, अघमोचन दुख हरता ॥ ४ ॥
अनगिन बरस बहुत चिरजीवौ, गुरु सुकदेव सहाई ।
सहजो बाई देत असीसैं, पावै दरस बधाई ॥ ५ ॥
( ४ )
सखीरी आज जन्मे लीला धारी ।
तिमिर भजैगो भक्ति खिड़ैगी३, पारायन नर नारी ॥ १ ॥
दर्सन करते आनँद उपजै, नाम लिये अघ नासै ।
चर्चा में सन्देह न रहसी, खुलिहै प्रबल प्रगासै ॥ २ ॥
बहुतक जीव ठिकानो पैहैं, आवागवन न होई ।
जम के दंड दहन पावक को, तिन कूँ मूल निकोई४ ॥ ३ ॥
होइ हैं जोगी प्रेमी ज्ञानी, ब्रह्म रूप ह्वै जाई ।
चरनदास परमारथ कारन, गावै सहजो बाई ॥ ४ ॥
( ५ )
सखीरी आज जन्म लियौ सुखदाई ।
दूसर कुल में प्रगट हुए हैं, बाजत अनँद बधाई ॥ १ ॥
(१) शुभ करनी । (२) परिपूर्ण । (३) खिलैगी । (४) उखाड़ दिया ।
मिश्रित ५१
भादों तीज सुदी दिन मंगल, सात घड़ी दिन आये ।
सम्मत सत्रहसाठ¹ हुते तब, सुभ समयो सब पाये ॥ २ ॥
जैजैकार भयो मधि गाऊँ, मात पिता मुख देखौ ।
जानत नाहिंन कौन पुरुष हैं, आये हैं नर भेषौ ॥ ३ ॥
संग चलावन अगम पन्थ कूँ, सूरज भक्ति उदय को ।
आप गुपाल साध तन धारचौ, निहचै मो मन ऐसो ॥ ४ ॥
गुरु सुकदेव नाँव धरि दीन्ह्यौ, चरनदास उपकारी ।
सहजो बाई तन मन वारै, नमो नमो बलिहारी ॥ ५ ॥
( ६ )
सखीरी आज आनँद देव बधाई ।
सतगुरु ने औतार लियो है, मिलि मिलि मंगल गाई ॥ १ ॥
अद्भुत लीला कहा बखानौं, मो पै कही न जाई ।
बहु बिधि बाजे बाजन लागे, सुनत हिया हुलसाई ॥ २ ॥
धन भादों धन तीज सुदी है, जा दिन प्रगटे आई ।
धन धन कुञ्जो भाग तिहारे, चरनदास सुत पाई ॥ ३ ॥
कलिजुग में हरि भक्ति चलाई, जन की करें सहाई ।
श्री सुकदेव करी जब किरपा, गावै सहजो बाई ॥ ४ ॥
( १ ) ॥ राग बिलावल ॥
मुकट लटक अटकी मन माहीं ।
नृत तन नटवर मदन मनोहर, कुण्डल झलक अलक² बिथुराई ॥१॥
नाक बुलाक हलत मुक्ताहल, होठ मटक गति भौंह चलाई ।
ठुमक ठुमक पग धरत धरनि पर, बाँह उठाय करत चतुराई ॥२॥
झुनक झुनक नूपुर झनकारत, तताथेई थेई रीझ रिझाई ।
चरनदास सहजो हिये अन्तर, भवन करौ जित रहौ सदाई ॥३॥
( २ )
हरि बिनु तेरौ ना हितू, कोइ या जग माहीं ।
अन्त समय तू देखि लें, कोइ गहै न बाँहीं ॥ १ ॥
(१) सत्रह सौ साठ । (२) घुँघराली लटैं ।
५२ सहजो बाई
जम सूँ कहा छुटा सकै, कोइ संग न होई।
नारी हू फटि रहि गई, स्वारथ कूँ रोई ॥ २ ॥
पुत्र कलित्तर कौन के, भाई अरु बन्धा।
सब ही ठोक जलाइ हैं, समझै नहिं अन्धा ॥ ३ ॥
महल दरब ह्वाँ ही रहे, पचि पचि करि जोड़ा।
करहा गज ठाढ़े रहें, चाकर और घोड़ा ॥ ४ ॥
पर काजै बहु दुख सहे, हरि सुमिरन खोया।
सहजो बाई जम घिरैं१, सिर धुनि धुनि रोया ॥ ५ ॥
॥ राग काफी ॥
नैनों लख लैनी साईं तैंड़े हजूर।
आगे पीछे दहिने बायें, सकल रहा भरपूर ॥ १ ॥
जिन को ज्ञान गुरू को नाहीं, सो जानत हैं दूर।
जोग जज्ञ तीरथ ब्रत साधै, पावत नाहीं कूर ॥ २ ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल जिमीं में, सोई हरि का नूर।
चरनदास गुरु मोहिं बतायौ, सहजो सब का मूर ॥ ३ ॥
॥ राग असावरी ॥
बाबा काया नगर बसावौ।
ज्ञान दृष्टि सूँ घट में देखौ, सुरति निरति लौ लावौ ॥ १ ॥
पाँच मारि मन बसि कर अपने, तीनों ताप नसावौ।
सत सन्तोष गहौ दृढ़ सेती, दुर्जन मारि भजावौ ॥ २ ॥
सील छिमा धीरज कूँ धारौ, अनहद बंब बजावौ।
पाप बानिया रहन न दीजै, धरम बजार लगावौ ॥ ३ ॥
सुबस बास होवै जब नगरी, बैरी रहै न कोई।
चरनदास गुरु अमल बतायौ, सहजो सँभलौ सोई ॥ ४ ॥
॥ राग बसंत ॥
आयो बसंत धन मेरे भाग। पाँचौ गावैं एक राग ॥ १ ॥
(१) जब जम ने घेर लिया।
मिश्रित ५३
और पचीसौ उनके संग । सो भी भींगे सरस रंग ॥२॥
मतवारे भये मन से भूप । सखि बिसरीं सब अपना रूप॥३॥
नगर लोग नहि तन सँभार । मगन भये सब वार वार ॥४॥
कह्यो न जाय उपज्यो अनन्द । और खेल सब भये मन्द ॥५॥
तिरबेनी तट करि बिहार । पीवत बैठे अमी धार ॥६॥
जोति बाल पूजे सुदेव । अगम अगोचर पायो भेव ॥७॥
सीस भेंट जो दीन्हो जाय । दरसन कीन्हे अति अघाय ॥८॥
चरनदास गुरु दई सैन । सहजो बाई पायो चैन ॥६॥
॥ राग होरी धनासरी ॥
( १ )
साधो मन माया के संग, सब जग रंग रह्यो ॥टेक॥
मूरख पचे खेल के अंधरे, नाना स्वाँग बनाय ।
ओसा धरि धरि नाचन लागे, चोवा चाह लगाय ॥ १ ॥
जोग करै सिधि आठौ चाहै, मान बड़ाई हेत ।
राज बासना भोग लोक के, कासी करवत लेत ॥ २ ॥
पंच अगिन बहु तापन लागे, बहुत अर्धमुख झूल ।
बहुतक दौड़ें अठसठ तीरथ, ज्ञान गली गये भूल ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु तत्त लखायौ, दोन्हे खेल छुटाय ।
सहजो बाई सीस निवावत, बार बार बलि जाय ॥ ४ ॥
( २ )
मैं तो खेलूँ प्रभु के संग, होरी रंग भरी ।
जित देखूँ तित रमि रहौ रे, सब में ब्यापक है हरी ॥१॥
सब कुछ भयो दियो सुख जन कूँ, अद्भुत लीला है करी ।
नाना जतन किये मिलवे कूँ, प्रीतम पायौ हम घरों¹ ॥२॥
पावत ही सब भ्रम भय भागे, आवागवन छुटो लरी² ।
जीवन मुक्त भयौ मन मेरौ, ब्याधा सब आसा जरी ॥३॥
(१) घर ही में । (२) डोरी ।
५४ सहजो बाई
अमर लोक पद फगुवा पैयै, जनम मरन बिपता दली१ ।
चरनदास गुरु किरपा कीन्ही, सहजो हिये आनँद रली ॥४॥
॥ राग काफी ॥
हरि हर जप लेनी औसर बीतो जाय ।
जो दिन गये सो फिर नहिं आवैं, कर बिचार मन लाय ॥
या जग बाजी साच न जानो, ता में मत भरमाय ।
कोइ किसी का है नहिं बौरै, नाहक लियो लगाय ॥
अंत समय कोइ काम न आवै, जब जम देहि बोलाय ।
चरनदास कहैं सहजो बाई, सत संगत सरनाय ॥
॥ राग बसंत ॥
आतम पूजा अधिक जान । सकल सिरोमन याहि मान ॥
बिस्तारो हित भवन२ माहिं । भरम दृष्टि जहँ आवै नाहिं ।
हिरदा कोमल ठौर लिया । कर बिचार जहँ धूप दिया ॥
या सेवा का दया मल । समता चंदन छिमा फूल ।
मीठे बचन सोइ बालभोग । निंदा झूठ तजो अजोग ॥
घंटा अनहद सुरत लाव । घट घट देखे एक भाव ॥
करौ सुखी सुख आप लेव । इस पूजा सों सुखी देव ॥
चरनदास गुरु दई मोहिं । हंस हंस जहँ जाप होहि ॥
इन्द्री मन बुध तहँ लगाव । कर सहजो बाई याको चाव ॥
( २ )
सो बसंत नहिं बार बार । तैं पाई मानुष देह सार ॥
यह औसर बिरथा न खोव । भक्ति बीज हिये धरती बोव ॥
सतसंगत को सींच नीर । सतगुरु जी सों करौ सीर ॥
नीकी बार बिचार देव । परन राख या कूँ जु सेव ॥
रखवारी कर हेत हेत । जब तेरी होवै जैत जैत ॥
(१) टरी । (२) अंतर, घट ।
मिश्रित ५५
खोट कपट पंछी उड़ाव । मोह प्यास सबही जलाव ॥
सँभलै बाड़ी नऊ अंग । प्रेम फूल फूलै रँग रंग ॥
पुहुप गँध माला बनाव । आदि पुरुष कूँ जा चढ़ाव ॥
तौ सहजो बाई चरनदास । तेरे मन की पुरवै सकल आस ॥
( ३ )
मिलि गावो रे साधो यह बसंत । जाकी अविगत लीला अगम पंथ ॥
जहँ नाँव पदारथ है इकङ्ग । नहिं पैये दूजा और अंग ॥
जहँ दरसै साधो एक एक । नहिं पैये दूजा कोई भेष ॥
जहँ ज्ञान ध्यान को लगो तार । जहँ आप बिराजै ओंकार ॥
देखो सब घट ब्यापक निराकार । कोई न पावै वह बिचार ॥
जहँ ब्रह्म अखंडित अति अनूप । जाको सुरमुनि जोगी ध्यावै भूप ॥
जहँ छाय रहो है सर्ब माहिं । कोई नहिं संतो खाली ठाहिं ॥
गुरु चरनदास पूरन औतार । जिन दान दियो जग ब्याध टार ॥
सहजो
५६ सहजो बाई
धर्म जिहाज माहिं चढ़ि लीजै, सँभल सँभल ता में पग दीजै ।
सम करि मन को संगी कीजै, हरि मारग को लागौ यार ॥१॥
बादवान पुनि ताहि चलावै, पाप भरै तौ हलन न पावै ।
काम क्रोध लूटन को आवै, सावधान है करौ सँभार ॥२॥
मान पहाड़ी तहाँ अड़त है, आसा तृस्ना भँवर पड़त है ।
पाँच मच्छ जहँ चोट करत हैं, ज्ञान आँखि बल बलौ निहार ॥३॥
ध्यान धनी का हिरदे धारै, गुरु किरपा सूँ लगै किनारे ।
जब तेरी बोहित उतरै पारे, जन्म मरन दुख बिपता टारे ॥४॥
चौथे पद में आनंद पावै, या जग में तू बहुरि न आवै ।
चरनदास गुरुदेव चितावैं, सहजो बाई यही बिचार ॥५॥
॥ राग ललित ॥
जाग जाग जो सुमिरन करै । आप तरै औरन लै तरै ॥टेक॥
हरि की भक्ति माहिं चित देवै । पद पंकज बिन और न सेवै ।
आन धरम कूँ संग न लेवै । फलन कामना सब परिहरै ॥१॥
काल ज्वाल सबही छुट जावै । आवा गवन की डोरि नसावै ।
जोनी संकट फिरि नहिं आवै । बार बार जनमै नहिं मरै ॥२॥
ऊँची पदवी जग में पावै । राजा राना सीस नवावै ।
तन छूटे जा मुक्ति समावै । जो पै ध्यान धनी का धरै ॥३॥
ह्याँ पै सुख जो जानै कूरा । गुर चरनन में लागै पूरा ।
बेग सम्हारै जो जन सूरा । चरनदास सहजो हो अर ॥४॥
॥ राग बिलावल ॥
तुम गुनवंत मैं औगुन भारी ।
तुम्हरी ओट खोट बहु कीन्हे, पतित उधारन लाल बिहारी ॥१॥
खान पान बोलत अरु डोलत, पाप करत है देह हमारी ।
कर्म बिचारौ तौ नहिं छूटौ, जो छूटौ तौ दया तुम्हारी ॥२॥
मैं अधोन माया बस हो करि, तुम सुधोन माया सूँ न्यारे ।
मैं अनाथ तुम नाथ गुसाई, सभ जीवन के प्रान पियारे ॥३॥
मिश्रित ५७
भौसागर में डर लागत मोहिं, तारौ बेगहि पार उतारी।
चरनदास गुरु किरपा सेती, सहजो पाई सरन तिहारी ॥४॥
॥ राग ईमान ॥
ज्यों त्यों राम नाम ही तारै।
जान अनजान अग्नि जो छूबै, वह जारै पै जारै ॥ १ ॥
उलटा सुलटा बीज गिरै ज्यौं, धरती माहीं कैसे।
उपजि रहै निहचै करि जानौ, हरि सुमिरन है ऐसे ॥ २ ॥
बेद पुरानन में मथि काढ़ा, राम नाम तत सारा।
तीन कांड¹ में अधिकौ जानौ, पाप जलावनहारा ॥ ३ ॥
हिरदा सुद्ध करै बुधि निरमल, ऊँची पदवी देवै।
चरनदास कहैं सहजो बाई, ब्याधा सब हरि लेवै ॥ ४ ॥
॥ राग रामकली ॥
अब तुम अपनी ओर निहारो।
हमरे औगुन पै नहिं जाओ, तुम्हहीं अपना बिरद सम्हारो॥१॥
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, वेद पुरानन गाई।
पतित-
५८ सहजो बाई
जैसी तैसी तुम्हहीं चीन्हेव । गुर है ध्यान खेलौना दीन्हेव ॥५॥
तुम्हरी रच्छा ही से जीऊँ । नाम तुम्हारो इमृत पीऊँ ॥६॥
दिष्टि तिहारो ऊपर मेरे । सदा रहूँ मैं सरनै तेरे ॥७॥
मारो झिड़कौ तौ नहिं जाऊँ । सरक सरक तुम्हीं पै आऊँ ॥८॥
चरनदास है सहजो दासी । हो रिच्छक पूरन अविनासी ॥६॥
॥ राग सोरठ ॥
जग में कहा कियौ तुम आय ।
स्वान की ज्यों पेट भरि कै, सोवौ जन्म गँवाय ॥ १ ॥
पहर पिछले नाहिं जागो, कियो ना सुभ कर्म ।
आन मारग जाय लागो, लियो ना गुरु धर्म ॥ २ ॥
जप न कीयो तप न साधो, दियो ना तैं दान ।
बहुत उरझो मोह मद में, आपु काया मान ॥ ३ ॥
देह घर है मौत का रे, आन काढै तोहि ।
एक छिन नहिं रहन पावै, जब कैसे कुछ होय ॥ ४ ॥
मिश्रित ५६
अमर भये जिन जिन यह खाई, भव नगरी नहिं आये ।
जो पछ करै सँभल दृढ़ राखै, सतगुरु बैद बताये ॥ २ ॥
सतसंगत को भवन बनावै, पड़दा लाज लगावै ।
जगत बासना पवन चलत है, सो आवन नहिं पावै ॥ ३ ॥
सूभ करम लै टेक टहलुवा, दीपक ज्ञान जलावै ।
नित्य अनित्य बिचार सार गहु, हो आसार बगावै ॥ ४ ॥
जीव रूप के रोग भगैं यों, ब्रह्म रूप ह्वै जावै ।
सहजो बाई सुन हुलसाव, चरनदास बतलावै ॥ ५ ॥
( २ )
तेरी लीला अधिक सोहावनी ।
देखि देखि मन हुलसत है, संतन के मन भावनी ॥ १ ॥
तत गुन करि ब्रह्मांड बनायौ, अधर धर्यो अचरज भयौ ।
जाके मध्य यही संसारा, भाँति भाँति रँग रँग ठयौ ॥ २ ॥
सात दीप नौ खंड रचे हैं, सुरग मिरत पाताल हीं ।
इच्छा करत सबै बनि आयौ, होइ गयौ ततकाल हीं ॥ ३ ॥
माया अगम अपार तुम्हारी, बरन सकै कहा बेद है ।
तीन गुननि तक बुध पहुँचत है, परे तुम्हारो भेद है ॥ ४ ॥
छिन में उतपति परलै छिन में, जो चाहौ सब कुछ बनै ।
चरनदास गुरु दृष्ट देइ जब, गुनाबाद सहजो भनै ॥ ५ ॥
( ३ )
परो मन हरि गुन गावत बान ।
बिन गोपाल और जो भाखै, तौ तोहि गुर की आन ॥ १ ॥
बेद माहिं ब्रह्मा गुन गावै, संकर सींगी माहि ।
सेस सहस मुख निस दिन गावै, समौ विचारत नाहिं ॥ २ ॥
बीन लिये नारद मुनि गावैं, गावैं ब्यास उचार ।
गनपति सारद गान करत हैं, गंधर्व सभी पुकार ॥ ३ ॥
गुनाबाद गावत प्रभु परसन, बड़े भक्त को भाव ।
६० सहजो बाई
सुकदेव गाव चरन हीं दासा, सहजो कूँ भी चाव ॥ ४ ॥
॥ राग पुरबी ॥
( १ )
हरि कौ कोइ न जानत भेद ।
सब के बड़े सोई पचि हारे, नेत नेत कहि बेद ॥ १ ॥
नाल माहिं ब्रह्मा नहिं आयो, थाकि फिरत केहि कीन ।
जोग ध्यान करि संकर हारे, थाह लेत भये लीन ॥ २ ॥
भेद न पायो सेस सारदा, सुरपति और गनेस ।
बामदेव और सनकादिक, निरे भक्त के भेस ॥ ३ ॥
ज्ञानी गुनी मुनी रिषि तेते, जेते जोगेसुर साध ।
चरनदास कह सहजो बाई, पंडित पोथी लाद ॥ ४ ॥
( २ )
मन तोहि कब उपजैगी स्यान ।
इंद्रिन के रस सूँ छुटि निर्मल, पारब्रह्म गलतान ॥ १ ॥
जग सूँ पीठ कहो कब दैहौ, सनमुख हरि की ओर ।
साधों की संगत कब करिहौ, कुल कुटुँब को छोड़ ॥ २ ॥
जप करिबे को कब तुम लगिहौ, चरन कमल के ध्यान ।
निस दिन आयु घटै तन छीजै, मनुष जनम की हान ॥ ३ ॥
तुम जो कहो मैं काल्ह करूँगी, काल्ह काल के हाथ ।
जा कारन ऐसी मति उपजै, सो झूठा है साथ ॥ ४ ॥
चरनदास गुरु मोहिं बतायो, सहजो हिरदे राख ।
भजनहिं एक सार वस्तु है, सब मिलि बेद पुरानन भाख ॥ ५ ॥
॥ राग बिलावल ॥
गुबिंद गुन क्यों नहिं गावो ।
ममता नींद कहा मन सूतो, जाग जाग हरि सों चित लावो ॥१॥
गुन गावत बहु पतित ऊधरे, ऊँची पदवी दीन्ही ।
जाति बरन सूँ ऊपर कीन्ही, आध ब्याध बिपता हरि लीन्ही ॥२॥
भौजल पार भये थिर हुए, आवागवन नसायो ।
वैसीही तुम्हरी गति होगी, करिजै औसर नीको पायो ॥३॥
आधी रात औ तरुन अवस्था, उठि करि ध्यान लगावै ।
ता की अस्तुति सेस करत है, सिव ब्रह्मादिक सीस नवावै ॥४॥
चरनहिं दास बनो पद सेवै, गुरु उपदेस सँभारौ ।
सहजो नवधा भक्ति करीजै, आप तिरौ औरन कूँ तारौ ॥५॥
॥ राग जैजैवंती ॥
( १ )
दसौ दिसा देख तो कूँ और कोई नाहीं ।
नख सिख राज रह्यो, वेदन के मद्ध कह्यो ।
सूत रह्यो की माला भयो, ऐसे ही सब माहीं ॥ १ ॥
सिंध हूँ की लहरैं जानौ, ता में सब पानी मानौ ।
ऐसे नहिं दूजा ठानौ, साईं साईं साईं ॥ २ ॥
ईसुर को रूप ह्वौ, ब्रह्मंड सब होइ रह्यो ।
नान्हे ही सरूप ह्वौ, तेरी गति पाई ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दई, आतम बिचार लई ।
सहजो बाई नाहिं रही, जैसे जल झाई ॥ ४ ॥
( २ )
मेरे इक सिर गोपाल और नहीं को भाई ॥टेक॥
आइ बैस हिये माहिं, और दूजा ध्यान नाहिं ।
मेरे तो सर्बस उन, औ हिताई वोई ॥ १ ॥
जाति हूँ की कान तजी, लोक हूँ की लाज भजी ।
दोनों कुल माहिं बजी, कहा करै सोई ॥ २ ॥
उघरी है प्रीत मेरी, निहचै हुई वा की चेरी ।
पहिरि हिये प्रेम बेरी, टूटै नहीं जोई ॥ ३ ॥
मैं जो चरनदास भई, गति मति सब खोइ दई ।
सहजो बाई नहीं रही, उठि गई दोई ॥ ४ ॥