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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

४४ सहजो बाई
॥ दसमी ॥
दसो दिसा भर पूर है ता में ये सब पिंड ।
ज्यों सरवर में बुदबुदे ब्रह्म बीच ब्रह्मांड ॥
ब्रह्म बीच ब्रह्मांड तासु को वार न पारा ।
ऐसो तत्त अगाध नेत कहि निगम पुकारा ॥
चरनदास कहें सहजिया गुरु से लेवौ ज्ञान ।
नैना होहिं अनन्त ही जब यह पावै जान ॥
॥ एकादसी ॥
ग्यारह गति जो चहत हौ तजौ जगत की आस ।
कलह कल्पना छाँड़ि के आतम में करि बास ॥
आतम में करि बास खैंच इन्द्री दस लावौ ।
मन इस्थिर जब होय सुरति और निरति मिलावौ ॥
ध्याता थाके ध्यान में ध्यान ध्येय के माहिं ।
जनम मरन मिटि सहजिया उपजै बिनसै नाहिं ॥
॥ द्वादसी ॥
द्वादस दावा दूर करि दावे ही में दुख ।
राग दोष और आपदा अकस निवारे सुख ॥
अकस निवारे सुख मोहिं चरनदास दुहाई ।
तामस सब हो त्याग तासु में बहुत भलाई ॥
काम क्रोध मद लोभ कूँ ज्ञान अगिन सूँ जार ।
जब निर्मल ह्वै सहजियो आनँद लहै अपार ॥
॥ तेरस ॥
तेरस तन अचरज महा छिनभंगी छल रूप ।
देखत ही देखत गये कहा रंक कहा भूप ॥
कहा रंक कहा भूप कोई रहने नहिं पावै ।
इत सूँ सबही जाहि बहुरि उत सूँ नहिं आवै ॥
इतने ऊपर घर करै महल दरब सन्तान ।
हाँसो आवै सहजिया ये मूरख मस्तान ॥