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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

५६ सहजो बाई
धर्म जिहाज माहिं चढ़ि लीजै, सँभल सँभल ता में पग दीजै ।
सम करि मन को संगी कीजै, हरि मारग को लागौ यार ॥१॥
बादवान पुनि ताहि चलावै, पाप भरै तौ हलन न पावै ।
काम क्रोध लूटन को आवै, सावधान है करौ सँभार ॥२॥
मान पहाड़ी तहाँ अड़त है, आसा तृस्ना भँवर पड़त है ।
पाँच मच्छ जहँ चोट करत हैं, ज्ञान आँखि बल बलौ निहार ॥३॥
ध्यान धनी का हिरदे धारै, गुरु किरपा सूँ लगै किनारे ।
जब तेरी बोहित उतरै पारे, जन्म मरन दुख बिपता टारे ॥४॥
चौथे पद में आनंद पावै, या जग में तू बहुरि न आवै ।
चरनदास गुरुदेव चितावैं, सहजो बाई यही बिचार ॥५॥
॥ राग ललित ॥
जाग जाग जो सुमिरन करै । आप तरै औरन लै तरै ॥टेक॥
हरि की भक्ति माहिं चित देवै । पद पंकज बिन और न सेवै ।
आन धरम कूँ संग न लेवै । फलन कामना सब परिहरै ॥१॥
काल ज्वाल सबही छुट जावै । आवा गवन की डोरि नसावै ।
जोनी संकट फिरि नहिं आवै । बार बार जनमै नहिं मरै ॥२॥
ऊँची पदवी जग में पावै । राजा राना सीस नवावै ।
तन छूटे जा मुक्ति समावै । जो पै ध्यान धनी का धरै ॥३॥
ह्याँ पै सुख जो जानै कूरा । गुर चरनन में लागै पूरा ।
बेग सम्हारै जो जन सूरा । चरनदास सहजो हो अर ॥४॥
॥ राग बिलावल ॥
तुम गुनवंत मैं औगुन भारी ।
तुम्हरी ओट खोट बहु कीन्हे, पतित उधारन लाल बिहारी ॥१॥
खान पान बोलत अरु डोलत, पाप करत है देह हमारी ।
कर्म बिचारौ तौ नहिं छूटौ, जो छूटौ तौ दया तुम्हारी ॥२॥
मैं अधोन माया बस हो करि, तुम सुधोन माया सूँ न्यारे ।
मैं अनाथ तुम नाथ गुसाई, सभ जीवन के प्रान पियारे ॥३॥