सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभौजल पार भये थिर हुए, आवागवन नसायो ।
वैसीही तुम्हरी गति होगी, करिजै औसर नीको पायो ॥३॥
आधी रात औ तरुन अवस्था, उठि करि ध्यान लगावै ।
ता की अस्तुति सेस करत है, सिव ब्रह्मादिक सीस नवावै ॥४॥
चरनहिं दास बनो पद सेवै, गुरु उपदेस सँभारौ ।
सहजो नवधा भक्ति करीजै, आप तिरौ औरन कूँ तारौ ॥५॥
॥ राग जैजैवंती ॥
( १ )
दसौ दिसा देख तो कूँ और कोई नाहीं ।
नख सिख राज रह्यो, वेदन के मद्ध कह्यो ।
सूत रह्यो की माला भयो, ऐसे ही सब माहीं ॥ १ ॥
सिंध हूँ की लहरैं जानौ, ता में सब पानी मानौ ।
ऐसे नहिं दूजा ठानौ, साईं साईं साईं ॥ २ ॥
ईसुर को रूप ह्वौ, ब्रह्मंड सब होइ रह्यो ।
नान्हे ही सरूप ह्वौ, तेरी गति पाई ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दई, आतम बिचार लई ।
सहजो बाई नाहिं रही, जैसे जल झाई ॥ ४ ॥
( २ )
मेरे इक सिर गोपाल और नहीं को भाई ॥टेक॥
आइ बैस हिये माहिं, और दूजा ध्यान नाहिं ।
मेरे तो सर्बस उन, औ हिताई वोई ॥ १ ॥
जाति हूँ की कान तजी, लोक हूँ की लाज भजी ।
दोनों कुल माहिं बजी, कहा करै सोई ॥ २ ॥
उघरी है प्रीत मेरी, निहचै हुई वा की चेरी ।
पहिरि हिये प्रेम बेरी, टूटै नहीं जोई ॥ ३ ॥
मैं जो चरनदास भई, गति मति सब खोइ दई ।
सहजो बाई नहीं रही, उठि गई दोई ॥ ४ ॥