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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

सोलह तिथि निर्णय ४३
जब आगे कूँ धाव देख करि जगमग जोती ।
बिन दामिनि चमकार सीप बिन उपजै मोती ॥
हंस हिंस जहँ होत है ओअं ओअं¹ होय ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो सुरति समोय ॥
॥ सातें ॥
सतसंगति ही कीजिये सत ही कथिये ज्ञान ।
सत ही मुख सूँ बोलिये सत ही कीजै ध्यान ॥
सत ही कीजै ध्यान हद तजि बेहद लागौ ।
तीन अवस्था छोड़ि जाय तुरिया सूँ पागौ ॥
निराकार निर्गुन तहाँ एकरस चेतन रूप ।
रात दिना सहजो नहीं नहीं छाँह नहि धूप ॥
॥ आठें ॥
आठन कूँ जाने नहीं दस कूँ नाहीं भेद ।
चौबीसो समझै नहीं कैसे छूटै खेद ॥
कैसे छूटै खेद पंच कूँ जीतै नाहीं ।
और पचीसौ संग रहै उनके² ही माहीं ॥
दोय सदा लागो रहै चौरासी के फेर ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो आपा हेर ॥
॥ नौमी ॥
निन्दा हिंसा त्याग करि तामस कूँ दे पीठ ।
चित कूँ अस्थिर कीजिये नासा आगे दीठ ॥
नासा आगे दीठ जहाँ कछु देखौ भाई ।
पाँच तत्त दरसायँ और अचरज दरसाई ॥
तिरदेवा और आठ सिधि देखौ इन्दूर³ भूप ।
चरनदास कहैं सहजिया साधन अधिक अनूप ॥
(१) ओंओं जहँ । (२) उन्हीं के । (३) चांद ।