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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

४८ सहजो बाई
मिश्रित पद
॥ राग गौरी ॥
नमो नमो गुरु तुम सरना ।
तुम्हरे ध्यान भरम भय भागैं, जीते पाँचौ मरना१ ॥१॥
दुख दारिद्र मिटै तुम नाऊँ, कर्म कटैं जो होहिं घना ।
लोक परलोक सकल बिधि सुधरै, पग लागैं आय ज्ञान गुना ॥२॥
चरन छुए सब गति मति पलटै, पारस जैसे लोह सुना२ ।
सीप परसि स्वाँती भयो मोती, सोहत है सिर राज रना ॥३॥
ब्रह्म होय जीव बुधि नासै, जब कैसो होना मरना ।
अमर होय अमरापद पावै, यह गुर कहिये गुरु बचना ॥४॥
चरनदास गुरु पूरे पाये, जग का दुख सुख क्यों सहना ।
सहजो बाई ब्याध छुटा कर, आनँद मंगल में रहना ॥५॥
॥ राग सोरठा ॥
( १ )
हमारे गुरु बचनन की टेक ।
आन धरम कूँ नाहिं जानूँ, जपूँ हरि हरि एक ॥ १ ॥
गुरु बिना नहिं पार उतरौ, करौ नाना भेख ।
रमौ तीरत बर्त राखौ, होहु पंडित सेख ॥ २ ॥
गुरु बिना नहिं ज्ञान दीपक, जाय ना अँधियार ।
काम क्रोध मद लोभ माहीं, उरझिया संसार ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दया करि कै, दिये मन्तर कान ।
सहजो घट परगास हूवा, गयौ सब अज्ञान ॥ ४ ॥
( २ )
भया हरि रस पी मतवारा ।
आठ पहर झूमत ही बीतै, डार दिया सब भारा ॥ १ ॥
(१) सोना ।