सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

५२ सहजो बाई
जम सूँ कहा छुटा सकै, कोइ संग न होई।
नारी हू फटि रहि गई, स्वारथ कूँ रोई ॥ २ ॥
पुत्र कलित्तर कौन के, भाई अरु बन्धा।
सब ही ठोक जलाइ हैं, समझै नहिं अन्धा ॥ ३ ॥
महल दरब ह्वाँ ही रहे, पचि पचि करि जोड़ा।
करहा गज ठाढ़े रहें, चाकर और घोड़ा ॥ ४ ॥
पर काजै बहु दुख सहे, हरि सुमिरन खोया।
सहजो बाई जम घिरैं१, सिर धुनि धुनि रोया ॥ ५ ॥
॥ राग काफी ॥
नैनों लख लैनी साईं तैंड़े हजूर।
आगे पीछे दहिने बायें, सकल रहा भरपूर ॥ १ ॥
जिन को ज्ञान गुरू को नाहीं, सो जानत हैं दूर।
जोग जज्ञ तीरथ ब्रत साधै, पावत नाहीं कूर ॥ २ ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल जिमीं में, सोई हरि का नूर।
चरनदास गुरु मोहिं बतायौ, सहजो सब का मूर ॥ ३ ॥
॥ राग असावरी ॥
बाबा काया नगर बसावौ।
ज्ञान दृष्टि सूँ घट में देखौ, सुरति निरति लौ लावौ ॥ १ ॥
पाँच मारि मन बसि कर अपने, तीनों ताप नसावौ।
सत सन्तोष गहौ दृढ़ सेती, दुर्जन मारि भजावौ ॥ २ ॥
सील छिमा धीरज कूँ धारौ, अनहद बंब बजावौ।
पाप बानिया रहन न दीजै, धरम बजार लगावौ ॥ ३ ॥
सुबस बास होवै जब नगरी, बैरी रहै न कोई।
चरनदास गुरु अमल बतायौ, सहजो सँभलौ सोई ॥ ४ ॥
॥ राग बसंत ॥
आयो बसंत धन मेरे भाग। पाँचौ गावैं एक राग ॥ १ ॥
(१) जब जम ने घेर लिया।