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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

४२ सहजो बाई
कैसे पावै चैन बिना साधू की संगत ।
दुनिया रंग पतंग मजीठी गुरु की रंगत ॥
जन्म मरन ता सूँ छुटै सहजो दरसै राम ।
चौरासी के दुख मिटै पावै निज पुर धाम ॥
॥ तीज ॥
तीज तनिक सुख कारने बहुत फसायो जीव ।
लालच लगि ऐसो गिरै जैसे मक्खी घीव ॥
जैसे मक्खी घीव डूब करि निकसै नाहीं ।
ऐसे यह नर बूड़ि रहै कुनबे के माहीं ॥
मनुखा देही पाय कै सहजो डारी खोय ।
जमपुर बाँधे वे चले चौरासी दुख होय ॥
॥ चौथ ॥
चौथ चहूँ दिस तिमिर है महा घोर भयमान ।
मूरख जन सोवत तहाँ मिथ्या ते अज्ञान ॥
मिथ्या ते अज्ञान सत्य कूँ जानत नाहीं ।
बन बन ढूँढ़त फिरत राम अपने ही माहीं ॥
ज्यों मिंहदी में रंग है लकड़ी मध्य हु तास ।
सहजो काया खोजि ले काहे रहत उदास ॥
॥ पाँचै ॥
पाँचौ इन्द्री बस करौ मन जीतन की ठान ।
पवन रोक अनहद लगौ पावौ पद निर्बान ॥
पावौ पद निर्बान करौ तुम ऐसी करनी ।
आसन संजम साध बन्ध लागै जब धरनी ॥
चित मन बुधि हंकार कूँ करौ इकट्ठे आन ।
सहजो निज मन होय जब निश्चल लागै ध्यान ॥
॥ छठ् ॥
छहूँ कँवल कूँ देख करि सतवें में घर छाव ।
रसना उलटि लगाव करि जब आगे कूँ धाव ॥