सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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अमर भये जिन जिन यह खाई, भव नगरी नहिं आये ।
जो पछ करै सँभल दृढ़ राखै, सतगुरु बैद बताये ॥ २ ॥
सतसंगत को भवन बनावै, पड़दा लाज लगावै ।
जगत बासना पवन चलत है, सो आवन नहिं पावै ॥ ३ ॥
सूभ करम लै टेक टहलुवा, दीपक ज्ञान जलावै ।
नित्य अनित्य बिचार सार गहु, हो आसार बगावै ॥ ४ ॥
जीव रूप के रोग भगैं यों, ब्रह्म रूप ह्वै जावै ।
सहजो बाई सुन हुलसाव, चरनदास बतलावै ॥ ५ ॥
( २ )
तेरी लीला अधिक सोहावनी ।
देखि देखि मन हुलसत है, संतन के मन भावनी ॥ १ ॥
तत गुन करि ब्रह्मांड बनायौ, अधर धर्यो अचरज भयौ ।
जाके मध्य यही संसारा, भाँति भाँति रँग रँग ठयौ ॥ २ ॥
सात दीप नौ खंड रचे हैं, सुरग मिरत पाताल हीं ।
इच्छा करत सबै बनि आयौ, होइ गयौ ततकाल हीं ॥ ३ ॥
माया अगम अपार तुम्हारी, बरन सकै कहा बेद है ।
तीन गुननि तक बुध पहुँचत है, परे तुम्हारो भेद है ॥ ४ ॥
छिन में उतपति परलै छिन में, जो चाहौ सब कुछ बनै ।
चरनदास गुरु दृष्ट देइ जब, गुनाबाद सहजो भनै ॥ ५ ॥
( ३ )
परो मन हरि गुन गावत बान ।
बिन गोपाल और जो भाखै, तौ तोहि गुर की आन ॥ १ ॥
बेद माहिं ब्रह्मा गुन गावै, संकर सींगी माहि ।
सेस सहस मुख निस दिन गावै, समौ विचारत नाहिं ॥ २ ॥
बीन लिये नारद मुनि गावैं, गावैं ब्यास उचार ।
गनपति सारद गान करत हैं, गंधर्व सभी पुकार ॥ ३ ॥
गुनाबाद गावत प्रभु परसन, बड़े भक्त को भाव ।