सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित पद ४६
इड़ा पिंगला ऊपर पहुँचे, सुखमन पाट उघारा।
पीवन लगे सुधारस जब ही, दुर्जन पड़ी बिडारा॥ २॥
गंग जमन बिच आसन मार्यौ, चमक चमक चमकारा।
भँवर गुफा में दृढ़ ह्वै बैठे, देख्यो अधिक उजारा॥ ३॥
चित इस्थिर चंचल मन थाका, पाँचौ का बल हारा।
चरनदास किरपा सूँ सहजो, भरम करम भए छारा॥ ४॥
। राग मलार ॥
( १ )
हमारे गुरु पूरन दातार।
अभय दान दीनन को दीन्हे, कीन्हें भवजल पार॥ १॥
जन्म जन्म के बन्धन काटे, जम की बंध निवार।
रंक हुते सो राजा कीन्हे, हरि धन दियौ अपार॥ २॥
देवैं ज्ञान भक्ति पुनि देवैं, जोग बतावनहार।
तन मन बचन सकल सुखदाई, हिरदे बुधि उँजियार॥ ३॥
सब दुख-गंजन पातक-भंजन, रंजन ध्यान बिचार।
साजन दुर्जन जो चलि आवै, एकहि दृष्टि निहार॥ ४॥
आनँद रूप सरूप मई है, लिप्त नहीं संसार।
चरनदास गुरु सहजो के रे, नमो नमो बारम्बार॥ ५॥
( २ )
अस जन धन जननी जिन जाये।
दूसर कुल में भक्ति नहीं थी, जा कूँ तारन आये॥ १॥
कारन परमारथ तन धार्यौ, बहुतक जीव उबारे।
खेवट ह्वै भवसागर माहौँ, सरन लगे सो तारे॥ २॥
मुक्ति सरूप भूप मन जोते, आसा सकल जराये।
भक्ति खेत में लोभ खरतुवा१, ता कूँ रहन न पाये२॥ ३॥
(१) मोथा घास जिसकी जड़ बड़ी लम्बी होती है। (२) लाये।