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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

मिश्रित ५१
भादों तीज सुदी दिन मंगल, सात घड़ी दिन आये ।
सम्मत सत्रहसाठ¹ हुते तब, सुभ समयो सब पाये ॥ २ ॥
जैजैकार भयो मधि गाऊँ, मात पिता मुख देखौ ।
जानत नाहिंन कौन पुरुष हैं, आये हैं नर भेषौ ॥ ३ ॥
संग चलावन अगम पन्थ कूँ, सूरज भक्ति उदय को ।
आप गुपाल साध तन धारचौ, निहचै मो मन ऐसो ॥ ४ ॥
गुरु सुकदेव नाँव धरि दीन्ह्यौ, चरनदास उपकारी ।
सहजो बाई तन मन वारै, नमो नमो बलिहारी ॥ ५ ॥
( ६ )
सखीरी आज आनँद देव बधाई ।
सतगुरु ने औतार लियो है, मिलि मिलि मंगल गाई ॥ १ ॥
अद्भुत लीला कहा बखानौं, मो पै कही न जाई ।
बहु बिधि बाजे बाजन लागे, सुनत हिया हुलसाई ॥ २ ॥
धन भादों धन तीज सुदी है, जा दिन प्रगटे आई ।
धन धन कुञ्जो भाग तिहारे, चरनदास सुत पाई ॥ ३ ॥
कलिजुग में हरि भक्ति चलाई, जन की करें सहाई ।
श्री सुकदेव करी जब किरपा, गावै सहजो बाई ॥ ४ ॥
( १ ) ॥ राग बिलावल ॥
मुकट लटक अटकी मन माहीं ।
नृत तन नटवर मदन मनोहर, कुण्डल झलक अलक² बिथुराई ॥१॥
नाक बुलाक हलत मुक्ताहल, होठ मटक गति भौंह चलाई ।
ठुमक ठुमक पग धरत धरनि पर, बाँह उठाय करत चतुराई ॥२॥
झुनक झुनक नूपुर झनकारत, तताथेई थेई रीझ रिझाई ।
चरनदास सहजो हिये अन्तर, भवन करौ जित रहौ सदाई ॥३॥
( २ )
हरि बिनु तेरौ ना हितू, कोइ या जग माहीं ।
अन्त समय तू देखि लें, कोइ गहै न बाँहीं ॥ १ ॥
(१) सत्रह सौ साठ । (२) घुँघराली लटैं ।