सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसात वार निर्णय ४७
( ५ )
थावर१ थिर करतार है, और सकल मिटि जाय ।
जा तें सूमति प्रीति करि, रहते चित्त लगाय ॥
रहते चित्त लगाय, तासु ने जग उपजाया ।
वा की सरनै आय, करै बहु बिधि को काया ॥
ऐसा हरि का नाम है, जनम मरन मिटि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, साचे सूँ लौ लाय ॥
( ६ )
एत जो आये जगत में, हरि सुमिरन के काज ।
ह्याँ कुछ कीया और ही, नेक न आई लाज ॥
नेक न आई लाज, साज सब खोटे कीन्हे ।
सदा रहे अज्ञान, राम घट में नहिं चीन्हे ॥
जैहौ जनम गँवाय के, पछितावा रहि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, कहा कियौ तन पाय ॥
( ७ )
सोम सिरीपति३ सेइये, गुरु की आयस४ लेय ।
सतसंगति अचरज कथा, ताही में मन देय ॥
ताही में मन देय, और ऊँचा नहिं या तें ।
और सकल धर्म उरै५, सभी थोथो है बातैं ॥
चरनदास कहै सहजिया, भक्ति सिरोमनि जान ।
तन धन चित बुध प्रान कूँ, ता में दीजै आन ॥
॥ दोहा ॥
सात वार ये मैं कहे, जा में हरि का भेद ।
जो कोइ समुझै प्रीति सूँ, छूटै सबही खेद ॥
सातो वारों बीच में, जग उपजै मिटि जाय ।
सहजो बाई हरि जपौ, आवागवन नसाय ॥
(१) अडोल । (२) इत, यहाँ । (३) श्रीपति = विष्णु । (४) आज्ञा । (५) वरे, पीछे ।
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