सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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और पचीसौ उनके संग । सो भी भींगे सरस रंग ॥२॥
मतवारे भये मन से भूप । सखि बिसरीं सब अपना रूप॥३॥
नगर लोग नहि तन सँभार । मगन भये सब वार वार ॥४॥
कह्यो न जाय उपज्यो अनन्द । और खेल सब भये मन्द ॥५॥
तिरबेनी तट करि बिहार । पीवत बैठे अमी धार ॥६॥
जोति बाल पूजे सुदेव । अगम अगोचर पायो भेव ॥७॥
सीस भेंट जो दीन्हो जाय । दरसन कीन्हे अति अघाय ॥८॥
चरनदास गुरु दई सैन । सहजो बाई पायो चैन ॥६॥
॥ राग होरी धनासरी ॥
( १ )
साधो मन माया के संग, सब जग रंग रह्यो ॥टेक॥
मूरख पचे खेल के अंधरे, नाना स्वाँग बनाय ।
ओसा धरि धरि नाचन लागे, चोवा चाह लगाय ॥ १ ॥
जोग करै सिधि आठौ चाहै, मान बड़ाई हेत ।
राज बासना भोग लोक के, कासी करवत लेत ॥ २ ॥
पंच अगिन बहु तापन लागे, बहुत अर्धमुख झूल ।
बहुतक दौड़ें अठसठ तीरथ, ज्ञान गली गये भूल ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु तत्त लखायौ, दोन्हे खेल छुटाय ।
सहजो बाई सीस निवावत, बार बार बलि जाय ॥ ४ ॥
( २ )
मैं तो खेलूँ प्रभु के संग, होरी रंग भरी ।
जित देखूँ तित रमि रहौ रे, सब में ब्यापक है हरी ॥१॥
सब कुछ भयो दियो सुख जन कूँ, अद्भुत लीला है करी ।
नाना जतन किये मिलवे कूँ, प्रीतम पायौ हम घरों¹ ॥२॥
पावत ही सब भ्रम भय भागे, आवागवन छुटो लरी² ।
जीवन मुक्त भयौ मन मेरौ, ब्याधा सब आसा जरी ॥३॥
(१) घर ही में । (२) डोरी ।