सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० सहजो बाई
सुकदेव गाव चरन हीं दासा, सहजो कूँ भी चाव ॥ ४ ॥
॥ राग पुरबी ॥
( १ )
हरि कौ कोइ न जानत भेद ।
सब के बड़े सोई पचि हारे, नेत नेत कहि बेद ॥ १ ॥
नाल माहिं ब्रह्मा नहिं आयो, थाकि फिरत केहि कीन ।
जोग ध्यान करि संकर हारे, थाह लेत भये लीन ॥ २ ॥
भेद न पायो सेस सारदा, सुरपति और गनेस ।
बामदेव और सनकादिक, निरे भक्त के भेस ॥ ३ ॥
ज्ञानी गुनी मुनी रिषि तेते, जेते जोगेसुर साध ।
चरनदास कह सहजो बाई, पंडित पोथी लाद ॥ ४ ॥
( २ )
मन तोहि कब उपजैगी स्यान ।
इंद्रिन के रस सूँ छुटि निर्मल, पारब्रह्म गलतान ॥ १ ॥
जग सूँ पीठ कहो कब दैहौ, सनमुख हरि की ओर ।
साधों की संगत कब करिहौ, कुल कुटुँब को छोड़ ॥ २ ॥
जप करिबे को कब तुम लगिहौ, चरन कमल के ध्यान ।
निस दिन आयु घटै तन छीजै, मनुष जनम की हान ॥ ३ ॥
तुम जो कहो मैं काल्ह करूँगी, काल्ह काल के हाथ ।
जा कारन ऐसी मति उपजै, सो झूठा है साथ ॥ ४ ॥
चरनदास गुरु मोहिं बतायो, सहजो हिरदे राख ।
भजनहिं एक सार वस्तु है, सब मिलि बेद पुरानन भाख ॥ ५ ॥
॥ राग बिलावल ॥
गुबिंद गुन क्यों नहिं गावो ।
ममता नींद कहा मन सूतो, जाग जाग हरि सों चित लावो ॥१॥
गुन गावत बहु पतित ऊधरे, ऊँची पदवी दीन्ही ।
जाति बरन सूँ ऊपर कीन्ही, आध ब्याध बिपता हरि लीन्ही ॥२॥