सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० सहजो बाई
ज्ञान जोग को सूरज प्रगट्यौ, बानी किरन पसारी ।
चार दिसा में भयौ उजारो, चौंक उठे नर नारी ॥ ४ ॥
प्रेम भलाभल नैनन माहीं, हिरदे सीतलताई ।
नख सिख सील सँतोष छिमा हीं, बरनै सहजो बाई ॥ ५ ॥
( ३ )
सखीरी आज धन धरती धन देसा ।
धन डहरा मेवात मँझारे, हरि आये जन भेसा ॥ १ ॥
धन भादों धन तीज सुदी है, धन दिन मंगलकारी ।
धन दूसर कुल बालक जनम्यौ, फुल्लित भये नर नारी ॥ २ ॥
धन धन माई कुञ्जो रानी, धन मुरलीधर ताता ।
अगले दत्तव१ अब फल पाये, तिन कै सुत भयौ ज्ञाता ॥ ३ ॥
भरम नसावन भक्ति बढ़ावन, बहु पारायन२ करता ।
सब फल दायक सब कुछ लायक, अघमोचन दुख हरता ॥ ४ ॥
अनगिन बरस बहुत चिरजीवौ, गुरु सुकदेव सहाई ।
सहजो बाई देत असीसैं, पावै दरस बधाई ॥ ५ ॥
( ४ )
सखीरी आज जन्मे लीला धारी ।
तिमिर भजैगो भक्ति खिड़ैगी३, पारायन नर नारी ॥ १ ॥
दर्सन करते आनँद उपजै, नाम लिये अघ नासै ।
चर्चा में सन्देह न रहसी, खुलिहै प्रबल प्रगासै ॥ २ ॥
बहुतक जीव ठिकानो पैहैं, आवागवन न होई ।
जम के दंड दहन पावक को, तिन कूँ मूल निकोई४ ॥ ३ ॥
होइ हैं जोगी प्रेमी ज्ञानी, ब्रह्म रूप ह्वै जाई ।
चरनदास परमारथ कारन, गावै सहजो बाई ॥ ४ ॥
( ५ )
सखीरी आज जन्म लियौ सुखदाई ।
दूसर कुल में प्रगट हुए हैं, बाजत अनँद बधाई ॥ १ ॥
(१) शुभ करनी । (२) परिपूर्ण । (३) खिलैगी । (४) उखाड़ दिया ।